Monday, 31 January 2022

मेजर सोमनाथ शर्मा

 प्रथम परमवीर चक्र विजेता 
मेजर सोमनाथ शर्मा 





*🖥️ महाराष्ट्र तंत्रस्नेही शिक्षक समूह 🖥️*
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       🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳
                 ▬ ❚❂❚❂❚ ▬                  संकलन : सुनिल हटवार ब्रम्हपुरी,          
             चंद्रपूर 9403183828                                                      
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          *मेजर सोमनाथ शर्मा*
(परमवीरचक्र सम्मान प्राप्त करने वाले भारतीय सेना के प्रथम अधिकारी)

      *जन्म : 31 जनवरी 1923*
(दध, कांगड़ा, पंजाब प्रान्त, ब्रिटिश भारत)
*देहांत : 3 नवम्बर 1947 (उम्र 24)*
         (बड़गाम, भारत)
निष्ठा : ब्रिटिश भारत, भारत
सेवा/शाखा : ब्रिटिश भारतीय सेना, भारतीय सेना
सेवा वर्ष : १९४२-१९४७
उपाधि : मेजर
सेवा संख्यांक : IC-521
दस्ता : चौथी बटालियन, कुमाऊं रेजिमेंट
युद्ध/झड़पें : द्वितीय विश्व युद्ध
भारत-पाकिस्तान युद्ध 1947
सम्मान : परमवीर चक्र
सम्बंध : जनरल वी एन शर्मा (भाई)
                 मेजर सोमनाथ शर्मा भारतीय सेना की कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमाण्डर थे जिन्होने अक्टूबर-नवम्बर, १९४७ के भारत-पाक संघर्ष में हिस्सा लिया था। उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया। परमवीर चक्र पाने वाले वे प्रथम व्यक्ति हैं।                                                                       १९४२ में सोमनाथ शर्मा जी की नियुक्ति उन्नीसवीं हैदराबाद रेजिमेन्ट की आठवीं बटालियन में हुई। उन्होंने बर्मा में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अराकन अभियान में अपनी सेवाएँ दी जिसके कारण उन्हें मेन्शंड इन डिस्पैचैस में स्थान मिला। बाद में उन्होंने १९४७ के भारत-पाक युद्ध में भी लड़े और ३ नवम्बर १९४७ को श्रीनगर विमानक्षेत्र से पाकिस्तानी घुसपैठियों को बेदख़ल करते समय वीरगति को प्राप्त हो गये। उनके युद्ध क्षेत्र में इस साहस के कारण मरणोपरान्त परम वीर चक्र मिला।

💁🏻‍♂️ *प्रारम्भिक जीवन*
                सोमनाथ शर्मा जी का जन्म ३१ जनवरी १९२३ को दध, कांगड़ा में हुआ था, जो ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रान्त में था और वर्तमान में भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश में है। उनके पिता अमर नाथ शर्मा एक सैन्य अधिकारी थे। उनके कई भाई-बहनों ने भारतीय सेना में अपनी सेवा दी। उनके कई भाई सेना में रह चुके थे।
                         सोमनाथ शर्मा ने देहरादून के प्रिन्स ऑफ़ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज में दाखिला लेने से पहले, शेरवुड कॉलेज, नैनीताल में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। बाद में उन्होंने रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट में अध्ययन किया। अपने बचपन में सोमनाथ शर्मा जी भगवद गीता में कृष्ण और अर्जुन की शिक्षाओं से प्रभावित हुए थे, जो उनके दादा द्वारा उन्हें सिखाई गई थी।

👮‍♂️ *सैन्य करियर*
                २२ फरवरी १९४२ को रॉयल मिलिट्री कॉलेज से स्नातक होने पर, श्री सोमनाथ शर्मा की नियुक्ति ब्रिटिश भारतीय सेना की उन्नीसवीं हैदराबाद रेजिमेन्ट की आठवीं बटालियन में हुई (जो कि बाद में भारतीय सेना के चौथी बटालियन, कुमाऊं रेजिमेंट के नाम से जानी जाने लगी)। उन्होंने बर्मा में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अराकन अभियान में जापानी सेनाओं के विरुद्ध लड़े। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अराकन अभियान बर्मा में जापानी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की। उस समय उन्होंने कर्नल के एस थिमैया की कमान के तहत काम किया, जो बाद में जनरल के पद तक पहुंचे और १९५७ से १९६१ तक सेना में रहे। श्री सोमनाथ शर्मा को अराकन अभियान की लड़ाई के दौरान भी भेजा गया था। अराकन अभियान में उनके योगदान के कारण उन्हें मेन्शंड इन डिस्पैचैस में स्थान मिला।
               अपने सैन्य कैरियर के दौरान, श्री सोमनाथ शर्मा, अपने कैप्टन के. डी. वासुदेव जी की वीरता से काफी प्रभावित थे। कैप्टन वासुदेव जी ने आठवीं बटालियन के साथ भी काम किया, जिसमें उन्होंने मलय अभियान में हिस्सा लिया था, जिसके दौरान उन्होंने जापानी आक्रमण से सैकड़ों सैनिकों की जान बचाई एवं उनका नेतृत्व किया।

💥  *बड़ग़ाम की लड़ाई*
                    बड़ग़ाम की लड़ाई और १९४७ का भारत-पाक युद्ध
२७ अक्टूबर १९४७ को,पाकिस्तान द्वारा २२ अक्टूबर को कश्मीर घाटी में आक्रमण के जवाब में भारतीय सेना के सैनिकों का एक बैच तैनात किया गया, जो भारत का हिस्सा था । ३१ अक्टूबर को, कुमाऊँ रेजिमेंट की ४ थी बटालियन की डी कंपनी, श्री सोमनाथ शर्मा की कमान के तहत श्रीनगर पहुंची थी। इस समय के दौरान उनके बाएं हाथ पर प्लास्टर चढ़ा था जो हॉकी फील्ड पर चोट के कारण लगा था, लेकिन उन्होंने अपनी कंपनी के साथ युद्ध में भाग लेने पर जोर दिया और बाद में उन्हें जाने की अनुमति दी गई।
                              ३ नवंबर को, गस्त के लिए, बड़गाम क्षेत्र में तीन कंपनियों का एक बैच तैनात किया गया था। उनका उद्देश्य उत्तर से श्रीनगर की ओर जाने वाले घुसपैठियों की जांच करना था। चूंकि दुश्मन की तरफ से कोई हरकत नहीं थी, दो तिहाई तैनात टुकड़ियाँ दोपहर २ बजे श्रीनगर लौट गईं। हालांकि, श्री सोमनाथ शर्मा की डी कंपनी को ३:०० बजे तक तैनात रहने का आदेश दिया गया था।

🏅 *परम वीर चक्र*
                    २१ जून १९४७ को, श्रीनगर हवाई अड्डे के बचाव में ,३ नवम्बर १९४७ को अपने कार्यों के लिए, परम वीर चक्र से श्री सोमनाथ शर्मा को सम्मानित किया गया था। यह पहली बार था जब इसकी स्थापना के बाद किसी व्यक्ति को सम्मानित किया गया था। संयोगवश, श्री शर्मा के भाई की पत्नी सावित्री बाई खानोलकर , परमवीर चक्र की डिजाइनर थी ।

🧭 *विरासत*
                   १९८० में जहाज़रानी मंत्रालय, भारत सरकार के उपक्रम भारतीय नौवहन निगम (भानौनि) ने अपने पन्द्रह तेल वाहक जहाज़ों के नाम परमवीर चक्र से सम्मानित महावीरों के सम्मान में उनके नाम पर रखे। तेल वाहक जहाज़ एमटी मेजर सोमनाथ शर्मा, पीवीसी ११ जून १९८४ को भानौनि को सौंपा गया। २५ सालों की सेवा के पश्चात जहाज़ को नौसनिक बेड़े से हटा लिया गया।

📯 *लोकप्रिय संस्कृति में*
             परम वीर चक्र विजेताओं के जीवन पर टीवी श्रृंखला का पहला एपिसोड, परम वीर चक्र (१९८८ ) ने ३ नवंबर १९४७ के श्री सोमनाथ शर्मा के कार्यों को शामिल किया था। उस प्रकरण में, उनका किरदार फारूक शेख द्वारा अभिनीत किया गया था। इस चेतन आनंद ने निर्देशित किया था।

✍️ *टिप्पणियाँ*
                वे मेजर जनरल के रूप में आर्म्ड मेडिकल सर्विस के डायरेक्टर जनरल पद पर रहते हुए सेवानिवृत्त हुए।
               उनके भाई सुरिन्दर नाथ शर्मा थलसेना में लेफ्टिनेन्ट जनरल रह चुके हैं (जो इंजिनियर-इन-चीफ पद से सेवानिवृत्त हुए) जबकि दूसरे भाई विश्वनाथ शर्मा १९८८-९० के दौरान थलसेनाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी बहन मेजर कमला तिवारी सेना में चिकित्सका थीं।

           🇮🇳 *जयहिंद*🇮🇳

🙏🌹 *विनम्र अभिवादन* 🌹🙏
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           स्त्रोत ~ WikipediA                                                                                                                                                                                                                                                        ➖➖➖➖➖➖➖➖➖                                          
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Sunday, 30 January 2022

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यांच्या विषयी भाषण व निबंध साठी उपयुक्त माहिती






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                 ▬ ❚❂❚❂❚ ▬                  संकलन : सुनिल हटवार ब्रम्हपुरी,          
             चंद्रपूर 9403183828                                                      
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             *राष्ट्रपिता महात्मा*
       *मोहनदास करमचंद गांधी*

    *जन्म: २ऑक्टोबर १८६९*
   (पोरबंदर, काठियावाड, ब्रिटिश  
     भारत, सध्याचे गुजरात राज्य)

    *मृत्यू : ३०जानेवारी १९४८*
            (नवी दिल्ली, भारत)

वडील : करमचंद
आई : पुतळीबाई
चळवळ : भारतीय स्वातंत्र्यलढा
संघटना : अखिल भारतीय काँग्रेस
पुरस्कार : टाईम साप्ताहिक-वर्षातील प्रसिद्ध व्यक्ती, Order of the Companions of O. R. Tambo
प्रमुख स्मारके : राजघाट
धर्म : हिंदू
प्रभाव : लिओ टॉलस्टॉय, जॉन 
      रस्किन, गोपाळ कृष्ण गोखले
पत्नी : कस्तुरबा गांधी
अपत्ये : हरीलाल, मणिलाल, 
             रामदास, देवदास

       मोहनदास करमचंद गांधी  हे भारताच्या स्वातंत्र्य संग्रामातील प्रमुख नेते आणि तत्त्वज्ञ होते. महात्मा गांधी या नावाने ते ओळखले जातात. अहिंसात्मक असहकार आंदोलनांनी गांधींनी भारताला स्वातंत्र्य मिळवून दिले. अहिंसात्मक मार्गांनी स्वातंत्र्य मिळवण्यासाठी त्यांनी संपूर्ण जगाला प्रेरित केले. रवींद्रनाथ टागोर यांनी सर्वप्रथम त्यांना ‘महात्मा’ (अर्थ: महान आत्मा) ही उपाधी दिली. भारतातील लोक त्यांना प्रेमाने बापू म्हणत आणि त्यांना अनधिकृपणे भारताचे राष्ट्रपिता म्हटले जाते. सुभाषचंद्र बोस यांनी इ.स. १९४४ मध्ये पहिल्यांदा त्यांना ‘राष्ट्रपिता’ असे संबोधले, असे म्हणतात. गांधी सविनय सत्याग्रहाच्या कल्पनेचे जनक होते. त्यांचा जन्मदिवस २ ऑक्टोबर हा भारतात गांधी जयंती म्हणून तर जगभरात आंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिन म्हणून साजरा केला जातो. या दिवशी भारतात सार्वजनिक सुट्टी असते.

असहकार आणि अहिंसेच्या तत्त्वावर आधारित सत्याग्रहाचा उपयोग गांधींनी प्रथम दक्षिण आफ्रिकेमध्ये, तेथील भारतीयांना त्यांचे नागरी हक्क मिळवून देण्यासाठी केला. इ.स. १९१५ मध्ये भारतात परत आल्यावर त्यांनी चंपारणमधील शेतकऱ्यांना जुलुमी कर व जमीनदार यांच्याविरुद्ध लढण्यासाठी एकत्र केले. इ.स. १९२१ मध्ये भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसची सूत्रे सांभाळल्यानंतर गरिबी निर्मूलन, आर्थिक स्वावलंबन, स्त्रियांचे समान हक्क, सर्व-धर्म-समभाव, अस्पृश्यता निवारण आणि सर्वांत महत्त्वाचे म्हणजे स्वराज्य यासाठी देशभरात चळवळ चालू केली. गांधी आजीवन साम्प्रदायीकातावादाचे (सम्प्रदायांवर राजकारण करणे) विरोधक होते आणि ते मोठ्या प्रमाणात सर्व धर्म आणि पंथ यांच्यापर्यंत पोहोचले. ढासळत जाणाऱ्या खिलाफत चळवळीला त्यानी आधार दिला आणि ते मुस्लिमांचे नेते बनले. इ.स. १९३० मध्ये इंग्रजांनी लादलेल्या मिठावरील कराविरोधात त्यांनी हजारो भारतीयांचे ४०० कि.मी. (२५० मैल) लांब दांडी यात्रेमध्ये प्रतिनिधित्व केले. इ.स. १९४२ मध्ये त्यांनी इंग्रजांविरुद्ध भारत छोडो आंदोलन चालू केले. या आणि यासारख्या इतर कारणांसाठी त्यांना भारतात तसेच दक्षिण आफ्रिकेमध्ये अनेकदा तुरुंगात टाकण्यात आले.

गांधींनी आयुष्यभर सत्य आणि अहिंसा या तत्त्वांचा पुरस्कार केला, स्वतःही याच तत्त्वांनुसार जगले आणि इतरांनीही तसे करावे असे सुचवले. त्यांनी खेड्यांना खऱ्या भारताचे मूळ म्हणून पाहिले आणि स्वयंपूर्णतेचा पुरस्कार केला. ब्रिटनमधील विन्स्टन चर्चिल यांनी १९३० साली त्यांची "अर्धनग्न फकीर" म्हणून निर्भत्सना केली. स्वतः कातलेल्या सुताचे धोतर आणि शाल अशी त्यांची साधी राहणी होती. त्यांनी शाकाहाराचा अवलंब केला आणि अनेकदा आत्मशुद्धीसाठी आणि राजकीय चळवळीसाठी साधन म्हणून दीर्घ उपवास केले. त्यांच्या शेवटच्या वर्षांमध्ये भारत पाकिस्तान फाळणीमुळे व्यथित झालेल्या गांधींनी हिंदू-मुस्लीम दंगे थांबवण्यासाठी प्रयत्‍न केले.

🙎‍♂ *महात्मा गांधी लहानपणीचे*

महात्मा गांधी इंग्लंड मध्ये
गांधींचा जन्म ऑक्टोबर २, इ.स. १८६९ या दिवशी सध्याच्या गुजरातमधील पोरबंदर शहरात झाला. त्यांच्या वडिलांचे नाव करमचंद आणि आईचे नाव पुतळीबाई होते. करमचंद गांधी तत्कालीन काठेवाड प्रांतातील पोरबंदरमध्ये दिवाण होते. त्यांच्या आजोबांचे नाव उत्तमचंद गांधी असे होते. त्यांना उत्ता गांधी असेदेखील म्हणत. पुतळीबाई या करमचंद यांच्या चौथ्या पत्‍नी होत्या. आधीच्या तीन पत्‍नी प्रसूतिदरम्यान मृत पावल्या होत्या. करमचंद हिंदू मोध समाजातील होते तर पुतळीबाई वैष्णव समाजातील. अत्यंत धार्मिक वातावरणातील बालपणाचा मोठा प्रभाव गांधीजींच्या पुढील आयुष्यावर दिसून येतो. विशेषत: अहिंसा, शाकाहार, सहिष्णुता, इतरांबद्दल करुणा या तत्त्वांचे बीज याच काळात रोवले गेले. जैन धार्मिक असलेल्या आईमुळे मोहनदास वर जैन संकल्पना आणि प्रथांचा प्रभाव होता. प्राचीन वांग्मय यातील श्रावणबाळ आणि हरिश्चंद्र या दोन कथांचा मोहनदासचा मनावर गहिरा परिणाम होता. स्वतःच्या आत्मचरित्रात ते कबुल करतात की या दोन कथांमुळे त्यांच्या मनावर अमिट परिणाम झाला होता. ते लिहितात "त्याने मला झपाटले आणि मी अगणित वेळा माझ्याशीच हरिश्चंन्द्रासारखा वागलो असेन" गांधीच्या सत्य आणि प्रेम या दैवी गुणाशी झालेल्या स्व: ओळखीचा माग हा या पौराणिक पात्रांपर्यंत येऊन पोहोचतो.

इ.स. १८८३ मध्ये वयाच्या तेराव्या वर्षी त्यांचा कस्तुरबा माखनजी यांच्या बरोबर बालविवाह झाला. त्यांचे नाव लहान करून कस्तुरबा (आणि प्रेमाने बा) असे घेतले जाई. पण त्या काळातील रिवाजानुसार कस्तुरबा बहुतांश काळ त्यांच्या वडिलांच्या घरीच होत्या. या प्रक्रियेत मोहनदासला शालेय शिक्षणाचे एक वर्ष गमवावे लागले. लग्नाच्या दिवसाच्या आठवणींबद्दल ते एकदा म्हणाले होते, "आम्हाला लग्नाबद्दल फार काही माहीत नसल्यामुळे लग्न म्हणजे आमचासाठी नवीन कपडे घालणे, गोड खाऊ खाणे आणि नातेवाइकांबरोबर खेळणे" हेच होते. इ.स. १८८५ मध्ये जेव्हा गांधीजी १५ वर्षांचे होते तेव्हा त्यांना पहिले अपत्य झाले, पण ते खूप कमी काळ जगले. त्याच वर्षी आधी वडील करमचंद गांधींचा स्वर्गवास झाला होता. पुढे गांधीजी आणि कस्तुरबा यांना अजून चार मुले झाली- इ.स. १८८८ मध्ये हरीलाल, इ.स. १८९२ मध्ये मणिलाल, इ.स. १८९७ मध्ये रामदास आणि इ.स. १९०० मध्ये देवदास.

त्यांच्या पोरबंदरमधील प्राथमिक तसेच राजकोटमधील माध्यमिक शिक्षणामध्ये ते एक साधारण विद्यार्थी होते. त्यांचा एका वार्षिक परीक्षेतील अहवाल पुढीलप्रमाणे होता - "इंग्रजीत चांगला, अंकगणितात ठीक आणि भूगोलात कच्चा. वर्तणूक अतिशय चांगली, हस्ताक्षर खराब " ते मॅट्रिकची परीक्षा भावनगरमधील सामलदास कॉलेजमधून थोड्या कष्टानेच पास झाले आणि तेथे असतांना, त्यांनी वकील व्हावे या त्यांच्या कुटुंबीयांच्या इच्छेबद्दल ते नाखूश होते.

👨‍🎓 *बॅरिस्टर*

शालेय शिक्षण संपवून वयाच्या एकोणिसाव्या वर्षी इ.स. १८८८ मध्ये ते इंग्लंडमध्ये लंडनला युनिव्हर्सिटी कॉलेज, वकिलीचे शिक्षण घेण्यास गेले. तेथे त्यानी इनर टेंपल या गावी राहून बॅरिस्टर होण्यासाठी भारतीय कायदा आणि न्यायशास्त्राचा अभ्यास केला. इंग्लंडला जाण्याआधी त्यांनी आईला जैन साधूच्या उपस्थितीत आपण मांस, बाई व बाटली (दारू) यापासून दूर राहू असे वचन दिले होते, त्याचे त्यांनी तिथे पालन केले. परंतु लंडन मधील सपक शाकाहारी जेवणाची चव त्यांना आवडली नाही. आणि लंडनमधील दुर्मिळ असलेली एक भारतीय खानावळ सापडेपर्यंत ते खूप वेळा उपाशी राहत. गांधींनी तेथे इंग्रजी चालीरीती ग्रहण करण्याचा प्रयत्‍न केला. उदाहरणार्थ नर्तनाची शिकवणी लावणे. ते इंग्लंडमध्ये शाकाहारी संस्थेचे सदस्य बनले आणि लवकरच त्याच्या अध्यक्षपदी पोहोचले. तेथे ज्या शाकाहारी व्यक्तीना गांधी भेटले, त्यातील काही स्त्रिया थिओसोफ़िकल सोसायटीच्या सदस्य होत्या. त्यांनी गांधीना आपल्यात येऊन मिळण्यासाठी आणि भाषांतरित आणि मूळ भगवद्‌गीता वाचण्यासाठी प्रोत्साहन दिले. आधी धार्मिक गोष्टीत रस नसणारे गांधी धार्मिक गोष्टीत रस घ्यायला लागले.

इंग्लंडमध्ये कायद्याचा अभ्यास करून ते बॅरिस्टर बनले आणि हिंदुस्थानात परत येऊन वकिली करू लागले. १८९१ मध्ये ते इंग्लंड सोडून परत भारतात आले. भारतात आल्यावर कळले की त्यांच्या आईचा ते लंडनमध्ये असतानाच देहान्त झाला आहे आणि त्यांच्या कुटुंबाने ही बातमी त्यांच्यापासून लपवून ठेवली. मुंबईमध्ये कायद्याची प्रॅक्टिस उभी करण्याची त्यांची योजना सफल झाली नाही कारण ते कोर्टात बोलण्यासाठी अतिशय लाजाळू होते. खटल्यांसाठी मसुदा तयार करण्याच्या साध्या जीवनाची सुरुवात करण्यासाठी ते राजकोटला परत आले परंतु एका ब्रिटिश अधिकार्‍याच्या विरोधात गेल्याने हे काम त्यांना बंद करावे लागले. १८९३ मध्ये त्यानी त्या काळच्या ब्रिटिश साम्राज्यामधील नाताळ (दक्षिण आफ्रिका) येथील दादा अब्दुल्ला आणि कंपनी नावाच्या एका भारतीय कंपनीतील एका पदासाठी एक वर्षाचा करार केला.

🇿🇦 *दक्षिण आफ्रिका*

गांधीनी आयुष्याची २१ वर्षे दक्षिण आफ्रिकेत घालवली, जेथे त्यानी त्यांचे राजकीय दृष्टिकोन, नैतिक आणि राजकीय नेतृत्व कौशल्ये विकसित केली. दक्षिण आफ्रिकेतील भारतीयांचे नेतृत्व असणाऱ्या श्रीमंत मुस्लिमांनी आणि अतिशय कमी अधिकार असणाऱ्या गरीब हिंदू गिरमिट्यानी(?) गांधीना नोकरी दिली. 'भारतीयत्व' सर्व धर्म आणि जातींमध्ये उतरले आहे असा दृष्टिकोन आयुष्यभर ठेवत गांधीनी या सर्वाना भारतीयच मानले. मुख्यत्वे धर्माच्या बाबतीत ऐतिहासिक भिन्नता आपण सांधू शकू असा त्यांना स्वतःबद्दल विश्वास होता, आणि हा विश्वास घेऊन ते भारतात आले. येथे त्यांनी या विश्वासाची अंमलबजावणी करण्याचा प्रयत्‍न केला.

दक्षिण आफ्रिकेमध्ये गांधींना समाजाच्या विकालांगाची ओळख झाली. भारतीय धर्म आणि संस्कृती यांमध्ये असलेल्या गुंतागुंतीच्या समस्यांपासून आपण दूर आहोत याची त्यांना जाणीव झाली आणि दक्षिण आफ्रिकेतील भारतीयांना समजून घेऊन व त्यांचे नेतृत्व करून आपणास भारत समजला असे ते मानू लागले.

दक्षिण आफ्रिकेत गांधीना गौरेतर लोकांबद्दल असलेल्या भेदभावाला सामोरे जावे लागले, तेथील भारतीयांना दिली जाणारी असमान वागणूक अनुभवली. पहिल्या वर्गाचे तिकिट असतांनासुद्धा त्यांना पीटरमारित्झबर्गमध्ये रेल्वे अधिकार्‍यांनी तृतीय वर्गाच्या डब्यात बसण्यास सांगितले. गांधीजीनी नकार देताच त्यांना अपमान करून आगगाडीमधून ढकलून देण्यात आले. ती संपूर्ण रात्र गांधीनी फलाटावरील गेस्टरूममध्ये काढली. (७ जून १८९३). गांधीनी ठरवले असते तर उद्दाम वर्तन करणार्‍या त्या रेल्वे अधिकार्‍यास ते अद्दल घडवू शकले असते. पण सूडभावनेने कोणाला शिक्षा करविणे हा त्यांचा हेतू नव्हता तर अन्यायकारक व्यवस्था बदलवणे हा त्यांचा हेतू होता.

पुढे एकदा, प्रवाशांना वाट करून न दिल्यामुळे वाहन चालकाने त्यांना मारले. पूर्ण प्रवासात त्यांना अनेक यातना सहन कराव्या लागल्या. अनेक हॉटेलमधून त्यांना हाकलून देण्यात आले. अशा अनेक घटनांपैकी अजून एक घटना म्हणजे, डर्बनमध्ये न्यायाधीशाने त्यांना त्यांची टोपी काढून ठेवण्याचा हुकूम दिला. गांधींनी तेव्हाही नकार दिला. या घटना त्यांच्या आयुष्याला कलाटणी देण्याऱ्या ठरल्या. हे सर्व अनुभव घेतल्यावर गांधीनी स्वतःचे समाजातील स्थान आणि ब्रिटिश राज्यातील आपल्या लोकांची किंमत याबद्दल प्रश्न उपस्थित करण्यास सुरुवात केली. अशाप्रकारे भारतीयांबद्दलच्या वंशभेद, असमानता यांना सामोरे गेल्यावर गांधींनी या अन्यायाविरुद्ध आवाज उठवण्यास व समाजात स्वतःचे स्थान निर्माण करण्यास सुरुवात केली.

तेथील भारतीयांचा मतदानाचा हक्क काढून घेणारा कायदा लागू करण्यात येणार होता, या कायद्याला विरोध करणाऱ्या भारतीयांना मदत करण्यासाठी गांधींनी आपले दक्षिण आफ्रिकेतील वास्तव्य काही काळासाठी वाढवले. हा कायदा रद्द करण्यात जरी ते अयशस्वी ठरले तरी यामुळे भारतीयांवरील अन्यायाकडे लक्ष वेधण्यात त्यांची चळवळ यशस्वी झाली. त्यांनी इ.स. १८९४ मध्ये नाताळ भारतीय काँग्रेसची स्थापना केली व याद्वारे दक्षिण आफ्रिकेतील विखुरलेल्या भारतीयांना त्यांनी एका राजकीय पक्षात परावर्तित केले. इ.स. १८९७ मध्ये काही काळाच्या भारतातील वास्तव्यानंतर दरबानमध्ये उतरत असताना काही गोर्‍या लोकांच्या जमावाने त्यांच्यावर हल्ला केला व त्यांना जिवे मारण्याचा प्रयत्‍न केला. आणि केवळ पोलीस अधीक्षकाच्या पत्‍नीच्या सहकार्याने त्यांची सुटका झाली. या घटनेत त्यांच्या तोंडाला इजा झाली आणि दोन दात तुटले. पण त्यांनी न्यायालयात तक्रार करण्यास नकार दिला. वैयक्तिक त्रासाबद्दल न्यायालयात जाणे त्यांच्या तत्त्वांमध्ये नव्हते.

इ.स. १९०६ मध्ये ट्रान्सवाल सरकारने एका नवीन कायद्याची घोषणा केली. या कायद्यानुसार तेथील प्रत्येक भारतीयाला स्वतःची नोंदणी करणे बंधनकारक झाले होते. याला विरोध करण्यासाठी बोलवलेल्या सभेमध्ये, त्या वर्षीच्या ११ सप्टेंबर ला, गांधींनी, पहिल्यांदाच आपल्या अजूनही विकसित होत असलेल्या असलेल्या सत्याग्रहाच्या किंवा अहिंसात्मक कार्यप्रणालीला आपलेसे केले. त्यांनी भारतीय बांधवांना अहिंसक पद्धतीने या कायद्यास विरोध करण्यास सांगितले व असे करतांना झालेले अत्याचार सहन करण्यास सांगितले. तेथील समुदायाने या आवाहनाला साद दिली आणि आगामी सात वर्षात हजारो भारतीयांनी हरताळ केल्यामुळे, नोंदणी करण्यास नकार दिल्यामुळे, नोंदणी पत्रक जाळून टाकणे आणि तत्सम अहिंसात्मक कार्यात सामील झाल्यामुळे लोकांनी तुरुंगवास भोगला, चाबकाचे फटके खाल्ले आणि बंदुकीच्या गोळ्याही खाल्या. सरकारने भारतीय आंदोलकांचा हा विरोध यशस्वीरीत्या मोडून काढला तरी पण या अहिंसक चळवळीची व लोकक्षोभाची नोंद घेण्यास आणि गांधींशी वाटाघाटी करण्यास स्वतः तत्त्वज्ञ असलेल्या दक्षिण आफ्रिकेतील नेता जॉन क्रिस्तिआन स्मट्स याला भाग पडले. शांततामय मार्गाने निदर्शने करणाऱ्या निदर्शकांवरील दक्षिण आफ्रिकेच्या सरकारने केलेल्या कठोर कारवायांमुळे लोकक्षोभ निर्माण झाला होता. गांधींच्या कल्पनांनी आकार घेतला आणि सत्याग्रहाची संकल्पना या संघर्षादरम्यान परिपक्व झाली.

१९०६ मध्ये इंग्रजांनी नाताळमध्ये झुलू राज्याविरुद्ध युद्ध पुकारले. इंग्रजांच्या बाजूने लढण्यासाठी भारतीयांना भरती करवून घेण्यासाठी गांधीनी इंग्रजांना प्रोत्साहित केले. भारतीयांनी पूर्ण नागरिकत्वाच्या दाव्यास वैध ठरवण्यासाठी इंग्रजांच्या पाठींबा देणे गरजेचे आहे असा युक्तिवाद त्यानी केला. ब्रिटिशानी गांधींची ही मागणी मान्य केली. आणि २० जणांच्या भारतीय स्वयंसेवकांच्या तुकडीला जाऊ दिले. जखमी सैनिकांना उपचार देण्यासाठी स्ट्रेचरवरून वाहून नेणे ही या तुकडीची जबाबदारी होती. ही तुकडी गांधींच्या नियंत्रणाखाली होती. दोन महिन्यांपेक्षाही कमी काळ या तुकडीने काम केले. या अनुभवातून ते असे शिकले की ब्रिटिशांच्या अपरिहार्य वाढणार्‍या मिलिटरी ताकदीस उघड उघड आवाहन देणे निराशाजनक आहे - त्यानी ठरवून टाकले कि याचा प्रतिकार हृदयातील पवित्र अश्या अहिंसात्मक पद्धतीनेच करता येईल. नंतर जेंव्हा काळ्या लोकांचे बहुमत सत्तेत आले तेंव्हा गांधीना राष्ट्रीय नायक म्हणून विविध स्मारकात घोषित करण्यात आले.

🇮🇳 *स्वातंत्र्यसंग्राम*

इ.स. १९१५मध्ये गांधीजी कायमसाठी भारतात परत आले. एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी, थिओरिस्ट आणि संघटक अशी त्यांची आंतरराष्ट्रीय ख्याती होती. ते भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसच्या अनेक संमेलनांतून बोलले. खर्‍या अर्थी भारताचे राजकारण व समस्या यांचा परिचय त्यांना गोपाळ कृष्ण गोखले यांनी करून दिला. गोपाळ कृष्ण गोखले हे तेव्हा भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसमध्ये प्रमुख नेते होते. गोखले त्यांच्या संयम, संतुलन आणि व्यवस्थेच्या आतमध्ये राहून काम करण्याच्या आग्रहाबद्दल ओळखले जात. आजही ते गांधीजींचे राजकीय गुरू म्हणून ओळखले जातात. गांधीनी गोखल्यांचा ब्रिटिशांच्या परंपरांवर आधारित उदार दृष्टिकोन अनुसरला, आणि तो पूर्णपणे भारतीय दिसण्यासाठी बदलला. १९२० मध्ये लोकमान्य टिळकांचा मृत्यू झाल्यावर ते राष्ट्रीय सभेचे प्रमुख नेते बनले.

गांधीनी १९२०मध्ये काँग्रेसच्या नेतृत्वाची सूत्रे हातात घेतली. त्यानंतर मागण्यांमध्ये सतत वाढ करत करत (काही ठिकाणी थांबत आणि तडजोड करत) २६ जानेवारी १९३० काँग्रेसने भारताचे स्वातंत्र्य जाहीर करून टाकले. अधिकाधिक वाटाघाटी होत गेल्या आणि काँग्रेसने १९३० मध्ये प्रांतीय सरकारमध्ये भाग घेऊ पर्यंत ब्रिटिशांना हे ओळखता आले नाही. १९३९च्या सप्टेंबर मध्ये कोणाशीही सल्लामसलत न करता व्हाईसरॉयने जेव्हा जर्मनीविरुद्ध युद्ध जाहीर केले तेंव्हा गांधीनी आणि काँग्रेसने ब्रिटिश सरकारचा पाठिंबा काढून घेतला. गांधीनी १९४२मध्ये तत्काळ स्वराज्याची मागणी करेपर्यंत आणि ब्रिटिश सरकारने प्रतिसाद म्हणून त्यांना आणि लाखो काँग्रेसच्या नेत्यांना तुरुंगात डांबेपर्यंत तणाव वाढतच गेला. दरम्यान मुस्लीम लीगने ब्रिटन ला सहकार्य केले, आणि गांधींच्या तीव्र विरोधाला डावलून मुस्लिमांच्या संपूर्ण स्वतंत्र राष्ट्राची, पाकिस्तानची मागणी केली. १९४७ मध्ये ब्रिटिशानी भूमीची फाळणी केली आणि गांधीनी अमान्य केलेल्या शर्तींवर भारत आणि पाकिस्तानने वेगवेगळे स्वातंत्र्य मिळवले.

🌎 *पहिल्या महायुद्धातील भूमिका*

एप्रिल १९१८ला पहिल्या महायुद्धाच्या नंतरच्या काळात, व्हाईसरॉय ने गांधीना दिल्लीत एका युद्ध परिषदेसाठी बोलावले. कदाचित गांधीनी त्यांचा इंग्रज साम्राज्यास असलेला पाठींबा दर्शवावा आणि भारताच्या स्वातंत्र्याच्या मागणीसाठी मदत मिळवावी हा त्यामागचा हेतू होता. गांधीनी भारतीयांना सक्रियपणे युद्धात उतरवण्याची तयारी दर्शवली. १९०६ मधील झुलू युद्ध आणि १९१४ मधील प्रथम जागतिक युद्धामधील भरतीच्या विरुद्ध या वेळी जेंव्हा त्यानी रुग्णवाहिका दलासाठी स्वयंसेवक भरती केले, तेंव्हा योद्धे भरती करण्याचा प्रयत्‍न केला. जून १९१८ला प्रसिद्ध केलेल्या एका ' फौजेत भारती होण्याचे आवाहन' मध्ये गांधी म्हणतात - "ही गोष्ट (स्वातंत्र्य) प्रत्यक्षात आणण्यासाठी आपल्यामध्ये स्वतःचे रक्षण करण्याची क्षमता असली पाहिजे, म्हणजेच शस्त्र बाळगण्याची आणि वापरण्याची क्षमता...... आपल्याला जर शस्त्र सर्वाधिक कौशल्याने वापरण्याची कला अवगत करायची असेल तर फौजेत भरती होणे हे आपले कर्तव्य आहे" असे जरी असले तरी व्हाईसरॉयच्या खासगी सचिवास लिहिलेल्या पत्रात ते म्हणतात "वैयक्तिकरीत्या कोणालाही, मित्र व शत्रूस, मारणार नाही अथवा जखमी करणार नाही."

गांधींच्या युद्धभरतीने त्यांच्या अहिंसेबद्दलच्या एकजिनसीपणावर प्रश्नचिन्ह निर्माण केले. त्यांचा मित्र चार्ली आंद्रीउस नमूद करतो - "वैयक्तिकरीत्या मला कधीही त्यांच्या ह्या वर्तणुकीचा त्यांच्या स्वतःच्या इतर वर्तनांशी मेळ घालता आला नाही. ज्यावर मी वेदनादायकरीत्या असहमत झालो आहे हा त्या मुद्यांपैकी एक आहे."

🎯 *चंपारण आणि खेडा*

महात्मा गांधी खेडा येथे १९१८
गांधीजीना पहिले मोठे यश १९१८ मध्ये चंपारण आणि खेडामधील सत्याग्रहात मिळाले. चंपारण, बिहारमधील जमीनदार, जे प्रामुख्याने ब्रिटिश होते, स्थानिक शेतकर्‍यांना सक्तीने नीळ उत्पादन करावयास लावत असत. त्यांना योग्य मोबदला पण मिळत नसे. यांमुळे ते सतत गरिबीत राहत. शेतकर्‍यांची गावे अत्यंत घाणेरडी आणि आरोग्याच्या दृष्टीने हानिकारक ठेवली जात. तसेच दारू, अस्पृश्यता, पडदा पद्धत अशा अनेक समस्या या गावांमध्ये होत्या. यावर भर म्हणजे तेथील दुष्काळ, पण इंग्रजानी तरीही अनेक जाचक कर लादले होते आणि ते वाढतच होते. गुजरातमधील खेडामध्येसुद्धा स्थिती काही वेगळी नव्हती. गांधीजींनी तिथे एक आश्रम उभारला. तिथे त्यांनी त्यांच्या लहान-मोठ्या सर्व अनुयायांना एकत्र केले. त्यांनी त्या भागातील परिस्थितीची माहिती गोळा केली व तिचा सखोल अभ्यास केला. गावकर्‍यांना विश्वासात घेऊन त्यांनी गावाच्या स्वच्छतेचे तसेच शाळा, रुग्णालयाच्या बांधकामाचे काम हाती घेतले. याचसोबत गावातील प्रमुखांना वर उल्लेखलेल्या प्रथा नष्ट करण्यास प्रवृत्त केले.

जेव्हा पोलिसांनी त्यांना प्रदेशात अशांतता निर्माण करण्याच्या गुन्ह्याखाली अटक केली व तो भाग सोडून जाण्यास सांगितले, तेव्हा गांधीजींचा प्रभाव जाणवून आला. हजारो लोकांनी या अटकेचा विरोध केला. त्यांनी गांधीजींच्या सुटकेसाठी तुरुंगाबाहेर, पोलिस स्थानकासमोर आणि न्यायालयासमोर मोर्चे काढले. न्यायालयाने शेवटी नाइलाजाने त्यांची मागणी मान्य केली. गांधीजींनी जमीनदारांविरुद्ध सुसंघटित आंदोलने चालू केली. याचा परिणाम म्हणजे तेथील जमीनदारांनी ब्रिटिश सरकारच्या मार्गदर्शनाखाली एक ठराव मंजूर केला. त्यानुसार शेतकर्‍यांना जास्त मोबदला आणि स्वतःच्या मतानुसार पीक घेण्याची मोकळीक मिळाली, तसेच करवाढ होऊन दुष्काळ असेपर्यंत कर भरण्यापासून सूट मिळाली. या आंदोलनादरम्यानच गांधीजींचा उल्लेख लोक ”’बापू”’ आणि ”’महात्मा”’ म्हणून करू लागले. खेडामध्ये सरदार पटेलांनी शेतकर्‍यांच्या बाजूने इंग्रजांसोबत वाटाघाटी केल्या. त्यानतर कर रद्द करण्यात आला आणि सर्वांची तुरुंगातून सुटका करण्यात आली. या आंदोलनामुळे गांधीजींची प्रसिद्धी सर्व भारतभर पोहोचली.

🤙 *असहकार*

गांधीजींनी असहकार, अहिंसा आणि शांततामय विरोध यांना शस्त्र म्हणून इंग्रजांविरुद्ध वापरले. पंजाबमध्ये जालियनवाला बाग हत्याकांडानंतर लोकांच्या क्रोधाचा उद्वेग झाला आणि अनेक ठिकाणी हिंसक विरोध झाले. गांधीजींनी जालियनवाला बाग हत्याकांड तसेच त्यानंतरचे हिंसक विरोध दोन्हींचा निषेध केला. त्यांनी या दंग्यांना बळी पडलेल्या ब्रिटिश नागरिकांबद्दल सहानुभुती दर्शविणारा आणि दंग्यांचा निषेध करणारा एक ठराव मांडला. या ठरावाला काँग्रेसमध्ये सुरुवातीला विरोध झाला. पण गांधीजींच्या तत्त्वांनुसार कोणत्याही प्रकारची हिंसा ही पाप होती आणि त्याचे समर्थन करता येणे शक्य नव्हते. हे तत्त्व मांडणार्‍या त्यांच्या भावनाप्रधान भाषणानंतर काँग्रेसने त्यांचा ठराव मान्य केला. पण या हत्याकांडाच्या आणि त्यानंतरच्या हिंसेच्या पश्चात गांधीजींनी आपले सर्व लक्ष पूर्ण स्वराज्यावर केंद्रित केले. त्यांच्या पूर्ण स्वराज्याच्या कल्पनेत पूर्ण वैयक्तिक, धार्मिक आणि राजकीय स्वातंत्र्य समाविष्ट होते.

डिसेंबर इ.स. १९२१ मध्ये भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसचे पूर्ण अधिकार गांधीजींना देण्यात आले. त्यांच्या नेतृत्वाखाली काँग्रेसची पुनर्बांधणी नवीन संविधानानुसार करण्यात आली. ज्याचा मुख्य उद्देश होता - स्वराज्य. पक्षाचे सभासदत्व थोड्याशा फीच्या मोबदल्यात सर्वांना खुले करण्यात आले. पक्षातील शिस्त वाढवण्यासाठी श्रेणीनुसार समित्या बनवल्या गेल्या. यामुळे फक्त उच्चभ्रूंसाठीच समजल्या जाणार्‍या पक्षाचे स्वरूप बदलले आणि काँग्रेस जनसामांन्याचे प्रतिनिधित्व करणारा पक्ष बनला. गांधीजींनी अहिंसेच्या तत्त्वाला स्वदेशीची जोड दिली. त्यांनी सर्वांना परदेशी - विशेषत: ब्रिटिश - वस्तूंचा बहिष्कार करण्याचे आवाहन केले. या तत्त्वानुसार सर्व भारतीयांनी ब्रिटिश कपड्यांच्या ऐवजी खादीचा उपयोग करावा असे अभिप्रेत होते. प्रत्येक भारतीय पुरूष आणि स्त्रीने, प्रत्येक गरीब आणि श्रीमंत व्यक्तीने, दिवसाचा काही काळ भारतीय स्वातंत्र्यलढ्याच्या समर्थनार्थ चरख्यावर सूत कातावे असा गांधीजींचा आग्रह होता. याचा मुख्य उद्देश शिस्त आणि स्वावलंबनाचे महत्त्व लोकांच्या मनावर ठसवणे तसेच स्त्रियांना स्वातंत्र्यलढ्यात सहभागी करूण घेणे हा होता. ब्रिटिश वस्तूंच्या बहिष्काराबरोबरच ब्रिटिश शैक्षणिक संस्थांचा बहिष्कार, सरकारी नोकरीचा त्याग आणि ब्रिटिशांनी दिलेल्या मान आणि पदव्यांचा त्याग करण्याचे आवाहन गांधीजींनी केले.

असहकार चळवळीला समाजातील सर्व स्तरांमधून उस्फूर्त प्रतिसाद मिळाला. पण असहकार चळवळ जोमात असतांनाच असस्मात थांबवण्यात आली. याला कारण ठरले,उत्तर प्रदेशमधील चौरी चौरा गावात चळवळीला मिळालेले हिंसक वळण. ४ फेब्रुवारी इ.स. १९२२ रोजी पोलिसांनी जमावावर केलेल्या गोळीबाराने संतप्त होऊन आंदोलकांनी पोलिसांवर हल्ला केला व नंतर पोलिस ठाण्याला आग लावली. जमावावरील गोळीबारात तीन जण मरण पावले तर पोलिस ठाण्यात २३ पोलिस जळून मरण पावले. पुढे अजून जास्त हिंसक घटना घडतील या भीतीने गांधीजींनी चळवळ स्थगित केली. १० मार्च इ.स. १९२२मध्ये गांधीजींना राजद्रोहाच्या आरोपाखाली अटक करण्यात आली व सहा वर्षांचा तुरुंगवास ठोठावण्यात आला. इ.स. १९२४ मध्ये दोन वर्षांच्या तुरुंगवासानंतर अपेंडिक्सच्या ऑपरेशनच्या कारणावरून त्यांची सुटका करण्यात आली.

गांधीजी तुरुंगात असतांना त्यांच्या नेतृत्वाअभावी काँग्रेसमध्ये फूट पडू लागली. शेवटी काँग्रेसचे दोन गटात विभाजन झाले. एका गटाचे नेतृत्व चित्तरंजन दास आणि मोतीलाल नेहरू यांच्याकडे होते. हा गटाचा कल संसदीय कार्यकारणीत भाग घेण्याकडे होता. पण चक्रवर्ती राजगोपालाचारी आणि सरदार पटेल यांच्या नेतृत्वाखालील दुसर्‍या गटाचा याला विरोध होता. हिंदू-मुस्लिमांमधला चळवळीदरम्यान वाढीस लागलेला एकोपासुद्धा हळूहळू कमी होत होता. गांधी़जींनी हे मतभेद दूर करण्याचे अनेक प्रयत्‍न केले. इ.स. १९२४ मध्ये त्यांनी यासाठी तीन आठवड्यांचा उपवास केला. पण या प्रयत्‍नांना म्हणावे तितके यश मिळाले नाही.

💁‍♂ *स्वराज्य आणि मिठाचा सत्याग्रह*

१९२०च्या दशकाचा मोठा काळ गांधीजी प्रत्यक्ष राजकारणापासून दूर राहिले आणि त्यांनी आपले लक्ष स्वराज्य पक्ष आणि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसमधील मतभेद दूर करण्यावर केंद्रित केले. या काळात त्यांनी समाजातील अस्पृश्यता, दारू समस्या आणि गरिबी कमी करण्याचे आपले प्रयत्‍न चालू ठेवले. राजकारणाच्या पटावर ते इ.स. १९२८ मध्ये परत आले. एक वर्ष आधी ब्रिटिश सरकारने संविधानात सुधारणा करण्यासाठी सर जॉन सायमन यांच्या अध्यक्षतेखाली एक समिती स्थापन केली होती. या समितीमध्ये एकपण भारतीय सदस्य नव्हता. या कारणाने भारतीय पक्षांनी या समितीवर बहिष्कार टाकला. गांधीजींनी १९२८ च्या कलकत्ता येथील काँग्रेसच्या अधिवेशनात एक ठराव पास केला. त्याद्वारे ब्रिटिश सरकारकडे भारताला सार्वभौम दर्जा देण्याची मागणी करण्यात आली व ही मागणी मंजूर न केल्यास परत पूर्ण स्वराज्यासाठी असहकार चळवळ सुरू करण्यात येईल असे बजावण्यात आले. पक्षातील सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू यांच्यासारख्या तरुण नेत्यांची मागणी तात्काळ स्वराज्याची होती. पण गांधीजींनी ब्रिटिश सरकारला उत्तरासाठी एका वर्षाचा अवधी दिला. पण ब्रिटिश सरकारने काही उत्तर दिले नाही आणि ३१ डिसेंबर इ.स. १९२९ मध्ये लाहोर अधिवेशनात भारताचा ध्वज फडकवण्यात आला. हा दिवस काँग्रेसने स्वराज्य दिन म्हणून साजरा केला. पक्षातील प्रत्येक लहान थोराने हा दिवस साजरा केला. गांधीजींनी मग मार्च इ.स. १९३० मध्ये मिठावरील कराच्या विरोधात सत्याग्रहाची घोषणा केली आणि त्याची परिणती प्रसिद्ध दांडी यात्रेत झाली. १२ मार्चला अहमदाबादहून निघालेली यात्रा, ६ एप्रिलला ४०० कि.मी.चा (२५० मैल) प्रवास करून दांडीला पोहोचली. हजारोंच्या संख्येने भारतीय या यात्रेत सहभागी झाले होते. ही यात्रा इंग्रजांची भारतातील पाळेमुळे उखडण्याच्या प्रयत्‍नांमधील सर्वांत यशस्वी प्रयत्‍न ठरली. ब्रिटिशांनी उत्तरादाखल ६०,००० हून अधिक लोकांना तुरूंगात डांबले.

शेवटी लॉर्ड एडवर्ड आयर्विन यांच्या नेतृत्वाखालील ब्रिटिश सरकारने गांधीजींशी वाटाघाटी करण्याचे ठरवले. मार्च इ.स. १९३१ मध्ये गांधी-आयर्विन करारावर स्वाक्षरी करण्यात आली. या करारानुसार ब्रिटिश सरकारने सर्व भारतीय कैद्यांना मुक्त करण्याचे मान्य केले आणि त्याबदल्यात कायदेभंगाची चळवळ बंद करण्याची मागणी घातली. याबरोबरच गांधीजींना भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसचा एकमेव प्रतिनिधी म्हणून लंडनमध्ये होणार्‍या गोल मेज परिषदेचे आमंत्रण दिले. ही परिषद गांधीजी आणि पक्षासाठी निराशाजनकच ठरली, कारण त्यामध्ये सत्तांतरणावर भर देण्याऎवजी भारतातील राजे-रजवाडे आणि अल्पसंख्यक यांच्यावर जास्त भर देण्यात आला होता. यातच भर म्हणजे आयर्विननंतर आलेले लॉर्ड विलिंग्डन यांनी राष्ट्रवाद्यांची चळवळ नरम पाडण्याचे प्रयत्‍न चालू केले. गांधी़जींना अटक करण्यात आली. त्यांचा अनुयायांवरील प्रभाव कमी करण्यासाठी त्यांना वेगळे करण्याचा हा डाव होता. पण त्यांचे हे प्रयत्‍न यशस्वी झाले नाहीत.

इ.स. १९३२ मध्ये बाबासाहेब आंबेडकरांच्या मागणीनुसार ब्रिटिश सरकारने दलितांना वेगळे मतदारसंघ देण्याचा निर्णय घेतला. याविरोधात गांधीजींनी सहा दिवसांचे उपोषण केले. यामुळे ब्रिटिश सरकारला अजून जास्त समानतेवर आधारित मतदारसंघ विभागणी करणे भाग पडले. या वाटाघाटी दलित समाजातील (भूतपूर्व क्रिकेट खेळाडू) पी. बाळू यांच्या मध्यस्थीने पार पडल्या. याबाबत गांधीजी आणि आंबेडकर यांच्यामध्ये पुण्यामध्ये झालेल्या करारास पुणे करार असे म्हटले जाते. येथून पुढे गांधीजींनी दलितांच्या उद्धारासाठी काम करणे चालू केले. ते दलितांना हरिजन (देवाची माणसे) म्हणत. ८ मे इ.स. १९३३ ला गांधीजींनी दलित चळवळीसाठी २१ दिवसाच्या उपोषणाची सुरुवात केली. त्यांचे हे प्रयत्‍न तितके यशस्वी ठरले नाहीत. दलित समाजामधून त्यांना पुरेसा पाठिंबा मिळाला नाही. आंबेडकरांनी दलितांना हरिजन म्हणण्याचा निषेध केला. त्यांच्या मते दलितांना हरिजन म्हणणे म्हणजे त्यांना सामाजिकदृष्ट्या अपरिपक्व म्हणण्यासारखे आहे आणि ते संबोधन, उच्च जातीं दलितांच्या पालक आहेत, असे प्रतीत करते. गांधीजी हे दलितांचे राजनैतिक हक्क हिरावून घेत आहेत असेपण आंबेडकर आणि त्यांच्या काही सहकार्‍यांना वाटत असे. आंबेडकरांसारखे दलित समाजातील नेते असतांनासुद्धा आणि स्वतः वैश्य असूनही, आपण दलितांची बाजू मांडू शकतो असा गांधीजींना विश्वास होता.

इ.स. १९३४ च्या उन्हाळ्यात गांधीजींवर तीन अयशस्वी प्राणघातकी हल्ले झाले.

जेव्हा काँग्रेसने निवडणूक लढवण्याचा आणि फेडरेशन आराखड्याअंतर्गत सत्ता हातात घेण्याचा निर्णय घेतला तेव्हा गांधीजींनी आपल्या पक्ष-सभासदत्वाचा राजीनामा दिला. गाधींजी पक्षाच्या या निर्यणाबद्दल असहमत नव्हते. पण त्यांना असे वाटले की, जर त्यांनी राजीनामा दिला तर, त्यांची भारतीयांमधील प्रसिद्धी, पक्षाच्या इतर साम्यवादी, समाजवादी, कामगार प्रतिनिधी, विद्यार्थी, धार्मिक रूढीतत्त्ववादी आणि व्यापारी वर्गातील प्रतिनिधींना आपले विचार जनतेसमोर मांडू देण्याच्या आड येणार नाही. तसेच गांधीजी राज (ब्रिटिश) सरकारमध्ये सहभाग स्वीकारलेल्या पक्षाचे (काँग्रेसचे) नेतृत्व करून इंग्रजांना त्यांच्याविरुद्ध बोलण्याची अजून एक संधी देऊ इच्छित नव्हते.

गांधीजी इ.स. १९३६ मध्ये पक्षात परत आले. तेव्हा जवाहरलाल नेहरूंच्या अध्यक्षतेखाली पक्षाचे लखनौ येथे अधिवेशन चालू होते. स्वातंत्र्यप्राप्तीनंतर भारताच्या भविष्याबद्दल विचार करण्यापेक्षा आधी पूर्ण स्वराज्य कसे मिळेल यावर सर्व लक्ष केंद्रित करण्यात यावे, असे गांधीजींचे मत होते. पण तरीही पक्षाच्या समाजवादी धोरणाचा अवलंब करण्याच्या निर्णयाला त्यांनी विरोध केला नाही. इ.स. १९३८ साली पक्षाध्यक्षपदी निवडून आलेले सुभाषचंद्र बोस आणि गांधीजीं यांच्यात अनेक वाद झाले. गांधीजींच्या या विरोधाची मूळ कारणे सुभाषचंद्रांचा अहिंसेवरील अविश्वासही होती. गांधीजींचा विरोध असूनसुद्धा बोस सलग दुसर्‍यांदा अध्यक्षपदी निवडून आले. पण जेव्हा सुभाषचंद्रांनी गांधीजींच्या तत्त्वांना सोडून दिले आहे असे कारण पुढे करून देशभरात अनेक पक्षनेत्यांनी सामुदायिक राजीनामे दिले, तेव्हा सुभाषचंद्र बोस यांनी अध्यक्षपदाचा राजीनामा दिला.

🌏 *दुसरे महायुद्ध आणि भारत छोडो आंदोलन*

 ८ ऑगस्ट १९४२. भारत छोडो आंदोलन. यानंतर लगेचच दुसरी दिवशी सकाळी गांधीना अटक करण्यात आली.
इ.स. १९३९ मध्ये जर्मनीने पोलंडवर आक्रमण केले आणि दुसर्‍या महायुद्धाला सुरुवात झाली. सुरुवातीला गांधीजी ब्रिटिशांना 'अहिंसक नैतिक पाठिंबा' देण्याच्या मताचे होते. पण पक्षातील इतर नेते, भारतीय लोकप्रतिनिधींचे मत घेतल्याशिवाय भारताला एकतर्फीपणे युद्धात ओढल्यामुळे नाखुश होते. सर्व काँग्रेस नेत्यांनी मंत्रिमंडळातून सामुदायिक राजीनामे देण्याचे ठरवले. दीर्घ विचारविनिमयानंतर गांधीजींनी जाहीर केले की, भारत या युद्धाचा एक भाग बनणार नाही, कारण हे युद्ध वरवर तर लोकशाहीवादी स्वातंत्र्यासाठी म्हणून लढवले जात होते आणि दुसरीकडे तेच स्वातंत्र्य भारताला नाकारण्यात येत होते. जसेजसे युद्ध पुढे सरकत गेले तसेतसे गांधीजी स्वातंत्र्याची मागणी तीव्र करत गेले. त्यांनी एक ठराव मांडला ज्याद्वारे इंग्रजांना 'भारत सोडून जा' (भारत छोडो) असे ठणकावण्यात आले. हा गांधीजी आणि पक्षाचा ब्रिटिशांना भारतातून हाकलून देण्याचा सर्वांत स्पष्ट व अंतिम प्रयत्‍न होता.

पक्षातील आणि इतरही काही नेत्यांनी गांधीजींवर टीका केली. यात ब्रिटिशांचे समर्थन करणारे तसेच त्यांना विरोध करणारे दोन्ही गट सामिल होते. काहींना वाटले की इंग्रजांच्या जीवनमरणाच्या अशा या युद्धात त्यांना विरोध करणे अनैतिक होय तर काहींचे मत होते की गांधीजी मिळालेल्या संधीचा पूर्ण उपयोग करून घेत नाही आहेत. भारत छोडो चळवळ भारताच्या स्वातंत्र्यसंग्रामातील सर्वांत प्रभावी चळवळ ठरली. यात लाखांच्या संख्येने लोकांना अटका झाल्या, अभूतपूर्व अत्याचार करण्यात आला. हजारो आंदोलक पोलिसांच्या गोळीबारात मरण पावले.गांधीजी आणि त्यांच्या सहकार्‍यांनी हे स्पष्ट केले की भारताला तात्काळ स्वातंत्र्य दिल्याशिवाय भारत महायुद्धात मदत करणार नाही. गांधीजींनी हेसुद्धा स्पष्ट केले की यावेळेस एखाद-दुसर्‍या हिंसक घटनेमुळे ही चळवळ मागे घेण्यात येणार नाही. आवरात ठेवलेल्या अराजकतेपेक्षा खरी अराजकता बरी. असे सुचवून त्यांनी काँग्रेस सदस्यांना अहिंसेचे पालन करण्याचे आवाहन केले आणि भारतीयांना 'करो या मरो' (करा किंवा मरा) हा मूलमंत्र दिला.

गांधीजी आणि काँग्रेसची पूर्ण कार्यकारणी समिती यांना इंग्रजांनी ९ ऑगस्ट इ.स. १९४२ ला मुंबईमध्ये अटक केली. गांधीजींना दोन वर्षासाठी पुण्यातील आगाखान पॅलेसमध्ये बंदिवासात ठेवण्यात आले. तेथील वास्तव्यात गांधीजींना वैयक्तिक आयुष्यात दोन धक्के सहन करावे लागले. सहा दिवसांनंतरच त्याचे खाजगी सचिव महादेव देसाई वयाच्या ५०व्या वर्षी हृदयविकाराच्या झटक्याने मरण पावले आणि त्यांच्या पत्‍नी कस्तुरबा १८ महिन्यांच्या बंदिवासानंतर २२ फेब्रुवारी इ.स. १९४४ ला मरण पावल्या. ६ अठवड्यांनंतरच गांधीजींना तीव्र मलेरिया झाला. त्यांच्या ढासळत्या प्रकृतीमुळे आणि ऑपरेशनच्या आवश्यकतेमुळे त्यांना युद्ध संपण्याआधीच ६ मे इ.स. १९४४ ला सोडण्यात आले. ते बंदिवासात मरण पावले तर संपूर्ण देश संतप्त होईल अशी भीती ब्रिटिश सरकारला वाटत होती. जरी भारत छोडो आंदोलनाला माफक यश मिळाले तरी करड्या जरबेने व कडक उपाययोजनांनी इंग्रजांनी इ.स. १९४३च्या अंतापर्यंत भारतातील आपले राज्य सुरळीत ठेवले होते. युद्धाच्या शेवटी इंग्रजांनी भारतीयांच्या हाती सत्ता देण्याचे स्पष्ट संकेत दिले. तेव्हा गांधीजींनी आंदोलन संपवले आणि जवळपास एक लाख राजनैतिक कैद्यांची सुटका करण्यात आली, ज्यामध्ये काँग्रेस नेत्यांचापण समावेश होता.

स्वातंत्र्य आणि भारताची फाळणी
इ.स. १९४६ मधील ब्रिटिश कॅबिनेट मिशनच्या शिफारशी नामंजूर करण्याची सूचना गांधीजींनी काँग्रेसला दिली. या शिफारशींमधील मुस्लिम बहुसंख्य राज्यांच्या एकत्रीकरणाबद्दल गांधीजी साशंक होते. त्यांच्या मते ही फाळणीची नांदी होती. पण जरी पक्ष गांधीजींचा सल्ला खचितच मानत असे, तरी यावेळी मात्र त्यांनी हा सल्ला मानला नाही. कारण पंडित नेहरू आणि पटेलांना माहित होते की जर ब्रिटिशांच्या शिफारशी मान्य नाही केल्या तर राज्य कारभाराचे नियंत्रण मुस्लिम लीग कडे जाईल. इ.स. १९४६ आणि इ.स. १९४८ च्या दरम्यान ५,००० हून जास्त व्यक्ती दंगलींमध्ये मारले गेले. गांधीजींनी अशा प्रत्येक योजनेचा जोरदार विरोध केला जी भारताची फाळणी दोन राष्ट्रांत करेल. भारतातील बहुसंख्य मुस्लिम, जे हिंदू आणि शिखांच्या सोबत राहत होते, ते फाळणीला अनुकुल होते. अजून म्हणजे, मुस्लिम लीगचे नेते, मोहम्मद अली जिना यांना, पश्चिम पंजाब, सिंध, उत्तर-पश्चिम फ्रंटियर प्रांत आणि पूर्व बंगालमध्ये बराच पाठिंबा होता. हिंदू-मुस्लिमांमधील अंतर्गत युद्ध टाळण्याचा एकमेव मार्ग म्हणून काँग्रेसने फाळणीच्या आराखड्याला मान्यता दिली. काँग्रेस नेत्यांना माहित होते की गांधीजी फाळणीला तीव्र विरोध करतील आणि गांधीजींच्या पक्षातील आणि देशातील पाठिंब्यामुळे त्यांच्या अनुमतीशिवाय पुढे जाता येणार नाही. गांधीजींच्या निकटच्या सहकार्‍यांनी फाळणीचा (त्या परिस्थितीतील) सर्वोत्तम पर्याय म्हणून स्विकार केला होता. सरदार पटेलांनी गांधीजींना पटवून देण्याचा प्रयत्‍न केला की, फाळणी हा अंतर्गत युद्ध टाळण्यासाठी एकमेव पर्याय आहे. शेवटी उद्ध्वस्त गांधीजींनी आपली अनुमती दिली.

त्यांनी उत्तर भारतातील तसेच बंगालमधील प्रक्षुब्ध जमावाला शांत करण्यासाठी हिंदू आणि मुस्लिम समाजातील नेत्यांसोबत दीर्घ चर्चा केल्या. इ.स. १९४७च्या भारत-पाकिस्तान युद्धाच्या पार्श्वभूमीवरदेखील, भारत सरकारचा फाळणी करारानुसार ठरलेले ५५ कोटी रूपये पाकिस्तानला न देण्याचा निर्णय त्यांना आवडला नाही. सरदार पटेलांसारख्या नेत्यांना वाटत होते की, या पैशांचा उपयोग पाकिस्तान युद्धासाठी भांडवल पुरवण्यासाठीच करेल. सर्व मुस्लिमांना पाकिस्तानात पाठवून द्यावे या मागणीने परत जोर पकडला होता. तसेच हिंदू आणि मुस्लिम नेते एकमेकांना समजून घेण्यात असमर्थता दाखवीत होते. या सर्व कारणांनी गांधीजी अत्यंत व्यथित झाले होते. त्यांनी या दंगली बंद करण्याच्या आणि पाकिस्तानला ५५ कोटी देण्याच्या मागणीसाठी आमरण उपोषण चालू केले. गांधीजींना भीती वाटत होती की, पाकिस्तानमधील अस्थिरतेमुळे आणि असुरक्षिततेमुळे तेथील लोकांचा भारताबद्दलचा राग वाढेल आणि या दंगली देशाच्या सीमा ओलांडून जातील, तसेच हिंदू आणि मुस्लिमांमधील शत्रुत्व परत डोके वर काढील आणि त्याची परिणिती अंतर्गत बंडात होईल. त्यांच्या आयुष्यभराच्या सहकार्‍यांसोबतच्या अनेक वादविवादांनंतरही गांधीजी आपल्या निर्णयावरून मागे हटले नाहीत आणि शेवटी सरकारने आपला निर्णय मागे घेतला आणि पाकिस्तानला ५५ कोटी रूपये दिले. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय हिंदू महासभा यांचे नेते यांचे तसेच अन्य हिंदू नेते, मुस्लिम नेते व शीख नेते यांनी हा हिंसाचार थांबवण्याचे आणि लोकांकडून शांतता राखण्याची मागणी करण्याचे वचन दिले. यानंतर गांधीजींनी संत्र्याचा रस पिऊन आपले उपोषण सोडले.

⏳ *मृत्यू*

३० जानेवारी १९४८ ला, दिल्लीच्या बिर्ला भवनच्या बागेतून लोकांबरोबर फिरत असतांना गांधीजींची गोळी मारून हत्या करण्यात आली. त्यांचा मारेकरू नथुराम गोडसे हा एक पुरोगामी हिंदू होता व त्याचे संबंध जहालमतवादी हिंदू महासभेशी होते. नथुराम गोडसेने महात्मा गांधी यांची हत्या करण्यासाठी बरेटा मॉडेलचे पिस्तूल वापरले होते. त्याच्या मते पाकिस्तानला पैसे देऊन भारताला दुबळे पाडण्यासाठी गांधीजी जबाबदार होते. गोडसे आणि त्याचा सहकारी नारायण आपटे यांच्यावर खटला दाखल करून त्यांना दोषी ठरवण्यात आले. त्यांना १५ नोव्हेंबर १९४९ ला फाशी देण्यात आली. गांधीजींच्या राजघाट येथील समाधीवर ’हे राम’ असे लिहिले आहे. हे त्यांचे शेवटचे शब्द होते असे अनेक जण मानतात, पण त्याची सत्यासत्यता वादग्रस्त आहे.

"माझ्या मित्र आणि सहकार्‍यांनो, आपल्या आयुष्यातून प्रकाश निघून गेला आहे आणि सर्वत्र अंधाराचे साम्राज्य पसरले आहे आणि मला कळत नाही आहे तुम्हाला काय आणि कसे सांगावे. आपले आवडते नेते-राष्ट्रपिता, ज्यांना आपण प्रेमाने ’बापू’ म्हणत असू, आता आपल्यामध्ये नाही आहेत. कदाचित तसे म्हणणे चूकच ठरेल, पण आपण त्यांना आता बघू शकणार नाहीत, जसे आपण त्यांना इतके वर्ष बघत आलो आहोत. (संकटांमध्ये) त्यांचा सल्ला घ्यायला आपण आता धावत जाऊ शकणार नाही. त्यांच्या सानिध्यातील शांती आणि समाधान आपल्याला मिळणार नाही. हा एक प्रचंड धक्का आहे, केवळ माझ्यासाठीच नव्हे, तर या देशातील कोट्यावधी लोकांसाठीसुद्धा."
गांधीजींच्या अस्थी रक्षापात्रांमध्ये भरून देशभरात त्यांना श्रद्धांजली वाहण्यासाठी पाठविण्यात आल्या. जवळपास सर्व अस्थींचे विसर्जन १२ फेब्रुवारी १९४८ ला अलाहाबाद येथील संगमावर करण्यात आले. पण काही अस्थी लपवण्यात आल्या होत्या. १९९७ मध्ये तुषार गांधी यांनी एका रक्षापात्राचे विसर्जन केले. हे रक्षापात्र एका बँकेमधील लॉकरमध्ये सापडले होते आणि न्यायालयात खटला दाखल करून हस्तगत करण्यात आले होते. ३० जानेवारीला त्यांच्या परिवाराने अजून एका रक्षापात्राचे विसर्जन मुंबईत गिरगाव चौपाटीवर केले. हे पात्र एका दुबईमधील व्यापार्‍याने मुंबईमधील एका वस्तुसंग्रहालयाला पाठविले होते. अजून एक रक्षापात्र पुण्यातील आगाखान पॅलेसमध्ये आहे (जिथे गांधीजी १९४२ आणि १९४४ च्या दरम्यान बंदिवासात होते) आणि दुसरे एक पात्र लॉस एंजेलस येथील सेल्फ रिअलायझेशन लेक श्राइन येथे आहे. त्यांच्या परिवाराला जाणीव आहे की तेथील अस्थी राजकीय फायद्यासाठी वापरल्या जाऊ शकतात. पण ते पात्र तिथून काढून घेतल्यास तो मठ बंद पडेल या भीतीने गांधीजींचे वंशज ते रक्षापात्र तिथून काढून घेऊ इच्छित नाहीत.

🔮 *तत्त्वे*

गांधीजीनी एकादश (अकरा) व्रतांचा स्वीकार केला होता. ती पुढीलप्रमाणे. अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह, शरीरश्रम, आस्वाद, सर्वत्र भयवर्जन (निर्भयता), सर्वधर्म सामान्ताव्य (सर्वधर्म समभाव), स्वदेशी, स्पर्शभावना (अस्पृश्यतेचा त्याग). निर्भयता या तत्वाला गांधीजी आधारभूत मानत. त्यांच्यामते निर्भयतेमुळेच इतर तत्वांचे पालन करता येऊ शकते.

💎 *सत्य*

गांधीजींनी आपले आयुष्य सत्याच्या शोधासाठी अर्पण केले होते. त्यांचे आत्मचरित्र माझे सत्याचे प्रयोग या नावाखाली प्रसिद्ध आहे. गांधीजींनी म्हटले आहे की, सर्वांत महत्त्वाची लढाई ही स्वतःच्या वाईट प्रवृत्ती, भय आणि असुरक्षितता यांच्यावर मात करणे ही होय. "परमेश्वर सत्य आहे." असे त्यांचे मत होते. पुढे त्यांनी ते, "सत्य (हेच) परमेश्वर आहे." असे बदलले.

🔮 *अहिंसा*

जरी अहिंसेचे तत्त्व गांधीजींनी स्वतः मांडले नसले तरी इतक्या मोठ्या राजकीय स्तरावर अहिंसेचा अवलंब करणारे ते पहिले व्यक्ती होते. हिंदू, बौद्ध, जैन, ज्यू धर्मात अनेक ठिकाणी अहिंसेच्या तत्त्वाचा उल्लेख आहे. "माझे सत्याचे प्रयोग" मध्ये गांधीजींनी त्यांचे अहिंसेचे तत्त्वज्ञान मांडले आहे. ते म्हणतात,

"जेव्हा मी निराश होतो,तेव्हा मी स्मरण करतो की, इतिहासात प्रत्येक वेळी सत्य आणि प्रेमाचाच विजय होत आला आहे. (इतिहासात) अनेक क्रूरकर्मे होऊन गेले आणि काही काळासाठी ते अजिंक्य पण वाटले, पण नेहमी शेवटी त्यांचा पराभवच झाला आहे-विचार करा, नेहमीच."
"विध्वंस हा सर्वंकषतावादाच्या नावाखाली केला गेला की, स्वातंत्र्य आणि लोकशाहीच्या नावाखाली-(त्यातील) मृतांसाठी, अनाथांसाठी आणि गृहहीनांसाठी काय फरक असणार?"
"डोळ्यासाठी डोळा सर्व जगाला आंधळे करून सोडेल."
"अशी अनेक ध्येये आहेत ज्यासाठी मी जीव द्यायला तयार आहे. पण असे एकही ध्येय नाही ज्यासाठी मी कुणाचा जीव घेईन."

पण गांधीजींना माहीत होते की, अहिंसेचे या पातळीपर्यंत पालन करण्यासाठी प्रचंड श्रद्धा आणि धैर्य आवश्यक आहे, आणि प्रत्येकाजवळच ते असणे शक्य नाही. त्यामुळे ते सल्ला देत की जर अहिंसा भित्रेपणाला झाकण्यासाठी वापरण्यात येत असेल तर प्रत्येकाने अहिंसेचे पालन करणे आवश्यक नाही.

⚛ *स्वदेशी*
      *शाकाहार*

लहानपणी अनेकदा गांधीजींनी मांस भक्षण केले होते. ते मुख्यत्वेकरून त्यांच्या कुतुहलामुळे तसेच त्यांचा मित्र शेख मेहताब याच्या सांगण्यावरून होते. शाकाहाराची कल्पना हिंदू तसेच जैन प्रथांमध्ये खोलवर रुजली आहे. तसेच गांधीजींची जन्मभूमी गुजरातमध्ये बहुतांश हिंदू आणि सर्व जैन शाकाहारी होते आणि गांधीजींचे कुटुंबही याला अपवाद नव्हते. लंडनला शिकायला जाण्याआधी गांधीजींनी त्यांची आई पुतळीबाई आणि काका बेचारजी स्वामी यांना वचन दिले होते की ते मांस, बाई व बाटली (दारू) यांच्यापासून दूर राहतील. पुढे गांधीजी कडक शाकाहारी बनले. त्यांनी "मोराल बेसिस ऑफ व्हेजिटेरिअनिझम" (Moral Basis of Vegetarianism) हे पुस्तक लिहिले आहे तसेच शाकाहारावर अनेक लेखसुद्धा लिहिले आहेत. त्यातील काही लेख लंडन व्हेजिटेरिअन सोसायटीच्या "द व्हेजिटेरिअन" या प्रकाशनातून प्रसिद्ध झाले आहेत.

✍ *लेखन*

महात्मा गांधींनी विपुल लेखन केले आहे. अनेक दशके त्यांनी बऱ्याच वर्तमानपत्रांचे संपादन केले. यामध्ये गुजराती, हिंदी आणि इंग्रजीमधील हरिजन, दक्षिण आफ्रिकेमध्ये असतांना इंडियन ओपिनियन आणि भारतात परत आल्यावर इंग्रजीमधील यंग इंडिया, गुजराती मासिक नवजीवन यांचा समावेश आहे. नंतर नवजीवन हिंदीमधून पण प्रकाशित केले गेले. या बरोबरच, ते जवळपास प्रत्येक दिवशी अनेक वर्तमानपत्रांना आणि व्यक्तींना पत्रे लिहीत असत.

गांधींनी काही पुस्तके सुद्धा लिहिली आहेत. त्यांचे आत्मचरित्र माझे सत्याचे प्रयोग या नावाखाली प्रकाशित झाले आहे. त्यांच्या दक्षिण आफ्रिकेतील संघर्षावर त्यांनी "Satyagraha in South Africa (दक्षिण आफ्रिकेतील सत्याग्रह)" हे पुस्तक लिहिले आहे. तसेच त्यांनी "हिंद स्वराज" किंवा "Indian Home" ही राजकीय पुस्तिका लिहिली आहे आणि जॉन रस्किनच्या "Unto This Last" चे गुजराती भाषांतर केले आहे. हा शेवटचा लेख त्यांच्या अर्थशास्त्रावरील विचारसरणीचे वर्णन करतो. त्यांनी शाकाहार, आहार आणि स्वास्थ्य, धर्म, सामाजिक परिवर्तन इत्यादी विषयांवरसुद्धा विपुल लेखन केले आहे. ते सामान्यतः गुजराथीमध्ये लिखाण करत, पण त्यांच्या पुस्तकांच्या हिंदी आणि इंग्रजी भाषांतरांचे परीक्षणसुद्धा ते करत असत.

गांधींचे पूर्ण लेखन भारत सरकारने "संकलित महात्मा गांधी" (The Collected Works of Mahatma Gandhi) या नावाखाली १९६०च्या दशकात प्रकाशित केले आहे. यामध्ये जवळपास १०० खंड व त्यांची ५०,००० पृष्ठसंख्या आहेत. इ.स. २००० मध्ये प्रकाशित झालेल्या संशोधित आवृत्तीवरून अनेक वाद झाले होते. सरकारने राजकीय फायद्यासाठी त्यात बदल केले आहेत असा आरोप गांधींच्या अनुयायांनी केला होता.

📖🖋 *गांधींनी लिहिलेली पुस्तके*

Indian Home Rule (हिंद स्वराज्य)
गांधीजींची संक्षिप्त आत्मकथा
गांधीजीचे जीवन त्यांच्याच शब्दांत
गांधी विचार दर्शन : अहिंसाविचार
गांधी विचार दर्शन : राजकारण
गांधी विचार दर्षन : सत्याग्रह प्रयोग
गांधी विचार दर्शन : सत्याग्रह विचार
गांधी विचार दर्शन : सत्याग्रहाची जन्मकथा
गांधी विचार दर्शन : हरिजन
नैतिक धर्म
माझ्या स्वप्नांचा भारत

📚 *गांधींवरील पुस्तके*

अनेक चरित्रकारांनी गांधींचे चरित्र लिहिले आहे. त्यांतील दोन चरित्रे विशेष उल्लेखनीय आहेत.

अखंड प्रेरणा गांधीविचारांची (डॉ. रघुनाथ माशेलकर)
अस्त गांधीयुगाचा आणि नंतर (अनंत ओगले)
अज्ञात गांधी नावाचे पुस्तक नारायणभाई देसाई यांनी लिहिले आहे. सुरेशचंद्र वारघडे यांनी त्याचे मराठीत भाषांतर केले आहे.
गंगेमध्ये गगन वितळले (अंबरीश मिश्र)
Gandhi-An Illustrated Biography (प्रमोद कपूर)
गांधीजी आणि त्यांचे टीकाकार (सुरेश द्वादशीवार, आधी भाषणमाला, मग लेखमाला (दोन्ही १५ ऑगस्ट २०१७ ते २४ फेब्रुवारी २०१८) आणि नंतर पुस्तक (२८ फेब्रुवारी २०१८)
गांधी उद्यासाठी (५० लेखांचा संग्रह, संपादक दिलीप कुलकर्णी)
गांधीजींचे असामान्य नेतृत्व
गांधीजींचे जीवन त्यांच्याच शब्दांत
गांधीजी होते म्हणून (बाळ पोतदार)
गांधींनंतरचा भारत (मूळ इंग्रजी लेखक रामचंद्र गुहा, मराठी अनुवाद शारदा साठे)
गांधी नावाचे महात्मा (अनेक विद्वानांनी लिहिलेल्या लेखांचा संग्रह-संपादक रॉय किणीकर)
गांधी पर्व १ (दोन खंड, गॊविंद तळवलकर)
गांधी : प्रथम त्यांस पाहता (मूळ थॉमस वेबर, मराठी अनुवाद सुजाता गोडबोले)
गांधी, विनोबा आणि जयप्रकाश (मिलिंद बोकील)
चले जाव आंदोलन (बा.बा. राजेघोरपडे)
डी. जी. तेंडुलकर यांचे आठ खंडी "Mahatma. Life of Mohandas Karamchand Gandhi" (उल्लेखनीय)
The Death & Afterlife of Mahatma Gandhi (इंग्रजी पुस्तक, २०१५; लेखक : मकरंद आर. परांजपे)
दुसरे प्रॉमिथियस : महात्मा गांधी (वि.स. खांडेकर)
बहुरूप गांधी (मूळ अनू बंदोपाध्याय, मराठी अनुवाद - शोभा भागवत)
बापू-माझी आई (मूळ मनुबहेन गांधी, मराठी अनुवाद - ना.गो. जोशी)
मराठीमध्ये पु.ल. देशपांडे आणि अवंतिकाबाई गोखले यांनी गांधीजींचे चरित्र लिहिले आहे.
प्यारेलाल आणि सुशीला नायर यांचे दहा खंडी "महात्मा गांधी". (उल्लेखनीय)
महात्मा आणि मुसलमान (यशवंत गोपाळ भावे)
महात्मा गांधी आणि भारतीय राज्यघटना (नरेंद्र चपळगावकर)
महात्मा गांधींची विचारसृष्टी (लेखक - यशवंत सुमंत)
महात्मा गांधी : जीवन आणि कार्य (अनुवादित, मूळ इंग्रजी The Life of Mahatma Gandhi, लेखक - लुई फिशर; मराठी अनुवादक : वि.रा. जोगळेकर). हेच पुस्तक वाचून रिचर्ड ॲटनबरो याने 'गांधी' सिनेमा बनवला..
राजमोहन गांधी यांनी’मोहनदास’ हे गांधींचे चरित्र लिहिले आहे, मुक्ता शिरीष देशपांडे यांनी ते मराठीत आणले आहे.
लेट्स किल गांधी (मूळ तुषार गांधी, अनुवाद अजित ठाकुर)
विधायक कार्यक्रम ()
शोध गांधींचा (चंद्रशेखर धर्माधिकारी)
सत्याग्रही समाजवाद व व मार्क्सवादाचा समन्वय : आचार्य शं. द. जावडेकरकृत मीमांसा (प्राचार्य डॉ. शिरीष पवार)
सूर्यासमोर काजवा : गांधीहत्येचा इतिहास (चुनीभाई वैद्य)

📽🎭 *चित्रपट/नाटके*

ब्रिटिश चित्रपट दिग्दर्शक सर रिचर्ड ॲटनबरो यांनी गांधीजींच्या आयुष्यावर इंग्रजी चित्रपटाची निर्मिती केली. यात महात्मा गांधींची भूमिका बेन किंग्जले या ब्रिटिश अभिनेत्याने केली. हा चित्रपट इ.स. १९८१ मध्ये प्रदर्शित झाला. या चित्रपटाने ८ ऑस्कर पुरस्कार जिंकून त्या वेळेस विक्रम स्थापला होता. या चित्रपटाचे हिंदीसह जगातील सर्वच मुख्य भाषेत भाषांतर झाले असून बॉक्स ऑफिसवरही या चित्रपटाने चांगले यश मिळवले.
इ.स. २००६ मध्ये बॉलिवुडमध्ये विधू विनोद चोपडा यांनी लगे रहो मुन्नाभाई या विनोदी चित्रपटाची निर्मिती केली. यात एक गुंड प्रवृतीचा नायक एका मुलीला प्रभावित करण्यासाठी आपण गांधीजींचे मोठे अनुयायी आहोत हे दाखवतो व त्यासाठी तो गांधींजींच्या तत्त्वज्ञानाचा अभ्यास करतो. त्यानंतर त्याला नेहेमी गांधीजी जवळ असल्याचे व त्याला चांगल्या मार्गावर नेण्यासाठी मार्गदर्शन करत असल्याचे भास होत राहतात. या चित्रपटात गांधीजींच्या अहिंसा व सत्याग्रह या तत्त्वांचा आजच्या काळातही वापर करता येतो हे दर्शविण्याचा प्रयत्‍न केला गेला आहे.
ॲन्ड गांधी गोज मिसिंग (मराठी लघुपट), दिग्दर्शक : देवेंद्र जाधव. सर्व भारतीय भाषांत अनुवाद
गांधी आडवा येतो (मराठी नाटक), लेखक : शफाअतखान
गांधी आणि आंबेडकर (मराठी नाटक), लेखक : प्रेमानंद गज्वी, या नाटकाचे कानडीतही प्रयोग झाले आहेत.
गांधी : माय फादर (हिरालाल गांधींवरील हिंदी चित्रपट) - २००७
गांधी व्हर्सेस गांधी (मराठी नाटक), लेखक : अजित दळवी, या नाटकाचा डी.एस. चौधरी यांनी कानडी भाषेत अनुवाद केला आहे.
गोडसे@गांधी.कॉम (हिंदी नाटक) लेखक : असगर वजाहत
मी नथूराम गोडसे बोलतोय (मराठी नाटक), लेखक : प्रदीप दळवी
द मेकिंग ऑफ महात्मा (श्याम बेनेगल दिग्दर्शित हिंदी चित्रपट) - १९९६
मोहन से महात्मा (हिंदी नाटक, डॉ.सुनील केशव देवधर, पुणे) : या नाटकाला विष्णुदास भावे पुरस्कार मिळाला आहे.
‘मोहनसे महात्मा’ या विषयावर गौरी कुलकर्णी नृत्याविष्कार करतात.
युगपुरुष (महात्मा गांधींच्या आध्यात्मिक गुरूं(जैन तत्त्ववेत्ते श्रीमद्‌ रामचंद्रजीं)वरील मूळ गुजराथी नाटक. लेखक - उत्तम गाडा. नाटकाचे गुजराथी, मराठी, हिंदी आणि कन्‍नड या भाषांत प्रयोग होत असतात. (एप्रिल २०१७)
हे राम (हिंदी चित्रपट, दिग्दर्शक - कमल हसन)
   
                 
        
          🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳

🙏🌹 *विनम्र अभिवादन* 🌹🙏

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Saturday, 22 January 2022

स्वामी रामानंद तीर्थ

 स्वामी रामानंद तीर्थ निबंध व भाषणासाठी उपयुक्त माहिती




*🖥️ महाराष्ट्र तंत्रस्नेही शिक्षक समूह 🖥️*

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       🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳

                 ▬ ❚❂❚❂❚ ▬                  संकलन : सुनिल हटवार ब्रम्हपुरी,          

             चंद्रपूर 9403183828                                                      

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        *स्वामी रामानंद तीर्थ*

                   *ऊर्फ*

*व्यंकटेश भगवानराव खेडगीकर*


*जन्म : ३ ऑक्टोबर १९०३*

          (सिंदगी, विजापूर)


*मृत्यू : २२ जानेवारी १९७२*

                 (हैद्राबाद)


चळवळ : हैदराबाद मुक्तिसंग्राम

पत्रकारिता/ लेखन: व्हिजन 

                              साप्ताहिक

धर्म : हिंदू

वडील : भगवानराव खेडगीकर


स्वामी रामानंद तीर्थ (ऊर्फ व्यंकटेश भगवानराव खेडगीकर) हे संन्यासी व हैदराबाद मुक्तिसंग्रामाचे नेतृत्व करणारे चळवळकर्ते होते. रामानंद तीर्थ यांचा जन्म विजापूर जिल्ह्यातील सिंदगी या ठिकाणी झाला. त्यांचे शिक्षण सोलापूर येथील सरकारी शाळेत झाले. उस्मानाबाद जिल्ह्यातील हिप्परगा या गावी गुरुकुलात ते कार्यरत होते. इ.स. १९३० मध्ये स्वामी नारायण तीर्थ यांनी रामानंदांना दीक्षा दिली व ते स्वामी रामानंद तीर्थ झाले. अंबेजोगाई या ठिकाणी त्यांनी योगेश्वरी नूतन विद्यालयाचे नूतनीकरण केले. 


🔮 *हैदराबाद मुक्तिसंग्राम*


हैदराबाद येथील निजामाचा सेनापती कासीम रझवी याच्या ‘रझाकार’ या संघटनेने मराठवाडा जनतेवर अत्याचार सुरू केले होते. याचा विरोध करणे आवश्यक झाले होते. यासाठी काम करणाऱ्या महाराष्ट्र परिषदेचे चिटणीस म्हणून स्वामी काम पाहत होते. यासाठीची चळवळ अनेक वर्षे चालली होती. २७ ऑक्टोबर, १९३८ रोजी स्वामी रामानंद सत्याग्रहासाठी कार्यकर्त्यांसह हैदराबाद शहरातील राजमार्गावर आले. त्यांना अटक झाली होती. ते सुमारे चार महिने कारावासात होते. सुटका होताच स्वामीजींनी भूमिगतपणे काम केले.


‘हैदराबाद संस्थान भारतीय संघराज्यात विलीन करून लोकशाही मान्य करा व संस्थानाचे स्वतंत्र अस्तित्व संपवा’ अशी हाक रामानंद तीर्थ यांनी सरकार आणि जनतेला दिली. याचा परिणाम होऊन लोक या संग्रामात सामील झाले. मुक्तिसंग्रामात आपल्या विचारांचा प्रसार करण्यासाठी त्यांनी ’व्हिजन’ हे साप्ताहिक चालवले होते. यामार्फत ते भारतीय स्वातंत्र्याच्या विचारांचा प्रचार करत. माणिकराव पहाडे, शंकरभाई पटेल, बाबासाहेब परांजपे. गोविंदभाई श्रॉफ हे तरुण स्वातंत्र्यसैनिक होते. हैदराबाद मुक्तिसंग्राम चळवळीत स्वामी रामानंद तीर्थ यांचे ते प्रमुख समर्थक होते.


तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल यांनी सशस्त्र पोलीस कारवाई करून निजामाला शरण आणले. हैदराबाद संस्थान १७ सप्टेंबर १९४८ रोजी भारतात विलीन झाले.


लोकसभेच्या लागोपाठच्या दोन निवडणुकांत गुलबर्गा व औरंगाबाद येथून रामानंद तीर्थ हे निवडून गेले होते. १९७२ साली त्यांचे हैदराबाद येथे निधन झाले.


🗽 *स्मृती*


एस. एम्. जोशींनी ‘प्रादेशिक ऐक्य व लोकशाहीसाठी स्वामीजींचे नाव सुवर्णाक्षरांनी लिहावे लागेल’ असा त्यांच्या कार्याचा गौरव केला आहे.

स्वामींच्या स्मृतिप्रीत्यर्थ नांदेड येथील विद्यापीठाला स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाडा विद्यापीठ असे नाव दिले आहे.

व्यंकटराव डावळे प्रतिष्ठान व राज्य सरकार यांच्यातर्फे अंबाजोगाई येथे चालविल्या जाणाऱ्या महाविद्यालयाला स्वामी रामानंद तीर्थ ग्रामीण वैद्यकीय महाविद्यालय असे नाव दिले आहे.

उस्मानाबाद येथे स्वामी रामानंद तीर्थ व्याख्यानमाला चालवली जाते.

        

          🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳


🙏🌹 *विनम्र अभिवादन* 🌹🙏


           ♾♾♾ *98* ♾♾♾

          स्त्रोत ~  WikipediA                                                                                                                                                                                                                                                      ➖➖➖➖➖➖➖➖➖                                          

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📡📲 *तंत्रज्ञानाची धरुनी वाट,*

*महाराष्ट्र करू स्मार्ट* 📡📲




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*✹ २२ जानेवारी ✹*

*स्वामी रामानंद तीर्थ स्मृतिदिन*

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जन्म - ३ ऑक्टोबर १९०३ (विजापूर)

स्मृती - २२ जानेवारी १९७२ (हैद्राबाद)


*हैदराबाद मुक्तिसंग्रामातिल मराठवाड्यासाठी योगदान देणारे नेतृत्व !*


स्वामी रामानंद तीर्थ (ऊर्फ व्यंकटेश भगवानराव खेडगीकर हे संन्यासी व हैदराबाद मुक्तिसंग्रामाचे नेतृत्व करणारे चळवळकर्ते होते. रामानंद तीर्थ यांचा जन्म विजापूर जिल्ह्यातील सिंदगी या ठिकाणी झाला. त्यांचे शिक्षण सोलापूर येथील सरकारी शाळेत झाले. 


उस्मानाबाद जिल्ह्यातील हिप्परगा या गावी गुरुकुलात ते कार्यरत होते. १९३० मध्ये स्वामी नारायण तीर्थ यांनी रामानंदांना दीक्षा दिली व ते स्वामी रामानंद तीर्थ झाले. अंबेजोगाई या ठिकाणी त्यांनी योगेश्वरी नूतन विद्यालयाचे नूतनीकरण केले.


हैदराबाद येथील निजामाचा सेनापती कासीम रझवी याच्या ‘रझाकार’ या संघटनेने मराठवाडा जनतेवर अत्याचार सुरू केले होते. याचा विरोध करणे आवश्यक झाले होते. यासाठी काम करणाऱ्या महाराष्ट्र परिषदेचे चिटणीस म्हणून स्वामी काम पाहत होते. यासाठीची चळवळ अनेक वर्षे चालली होती. २७ ऑक्टोबर १९३८ रोजी स्वामी रामानंद सत्याग्रहा साठी कार्यकर्त्यांसह हैदराबाद शहरातील राजमार्गावर आले. त्यांना अटक झाली होती. ते सुमारे चार महिने कारावासात होते. सुटका होताच स्वामीजींनी भूमिगतपणे काम केले.


‘हैदराबाद संस्थान भारतीय संघराज्यात विलीन करून लोकशाही मान्य करा व संस्थानाचे स्वतंत्र अस्तित्व संपवा’ अशी हाक रामानंद तीर्थ यांनी सरकार आणि जनतेला दिली. याचा परिणाम होऊन लोक या संग्रामात सामील झाले. मुक्तिसंग्रामात आपल्या विचारांचा प्रसार करण्यासाठी त्यांनी ’व्हिजन’ हे साप्ताहिक चालवले होते. यामार्फत ते भारतीय स्वातंत्र्याच्या विचारांचा प्रचार करत. 


माणिकराव पहाडे, शंकरभाई पटेल, बाबासाहेब परांजपे. गोविंदभाई श्रॉफ हे तरुण स्वातंत्र्यसैनिक होते. हैदराबाद मुक्तिसंग्राम चळवळीत स्वामी रामानंद तीर्थ यांचे ते प्रमुख समर्थक होते.


तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल यांनी सशस्त्र पोलीस कारवाई करून निजामाला शरण आणले. हैदराबाद संस्थान १७ सप्टेंबर १९४८ रोजी भारतात विलीन झाले.


लोकसभेच्या लागोपाठच्या दोन निवडणुकात गुलबर्गा व औरंगाबाद येथून रामानंद तीर्थ हे निवडून गेले होते. 


१९७२ साली त्यांचे हैदराबाद येथे निधन झाले.


*संकलन : मिलिंद पंडित*


*संदर्भ : विकिपीडिया*

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Tuesday, 18 January 2022

नांदेड जिल्हा माहिती

 माझा नांदेड






माझ्या नांदेड विषयी अद्भुत माहिती

🏘नांदेड - एक दृष्टीक्षेप🏦 MS

महाराष्ट्र राज्यात दक्षिण टोकाला तेलंगाणा राज्याच्या सीमेलगत नांदेड जिल्हा वसलेला आहे. "नांदेड" या नावाचा उगम "नंदी-तट" या शब्दामधून झालेला असून, "नंदी" म्हणजे भगवान श्री शंकराचे वाहन आहे आणि "तट" म्हणजे पवित्र गोदावरी नदीचा काठ, नंदीने गोदावरी नदीच्या किनार-यावर तपस्या केली असल्याची आख्यायिका आहे. आज नांदेड जिल्हा हुजूर साहेब नांदेड या नावाने प्रख्यात झाला आहे, शीख धर्माचे गुरु श्री गुरु गोविंद सिंघजी महाराज यांनी सन १७०५ मध्ये या ठिकाणी आपला देह ठेवला.

नांदेड हे सन १७२५ मध्ये हैद्राबाद संस्थानाचा हिस्सा झाले आणि १९४७ नंतर भारताच्या स्वातत्र्यानंतरही निजाम संस्थाने आपले स्वतंत्र अस्तित्व राखल्याने नांदेड हैद्राबाद संस्थानाचाच हिस्सा बनून राहीले. हैद्राबाद संस्थानाविरुद्ध केलेल्या भारत सरकारच्या पोलीस कारावाईनंतर १७ सप्टेंबर १९४८ रोजी हैदराबाद संस्थान स्वतंत्र भारत देशात समाविष्ट झाले

प्राचीन राजवंश

इसवीसन पुर्व सहाव्या शतकाच्या सुमारास महाराष्ट्रातील विविध प्रदेश अश्मक, कुंतल, मलक, अपरांता, ऋषिक नावाने संबोधिले जाऊ लागले. नांदेड भोवतीच्या प्रदेशाचा समावेश त्याकाळी विदर्भात होत असे. या भागाची दक्षिण सीमा गोदावरी नदीपर्यंत होती. नांदेड हे नावच मुळी गोदावरीशी निगडीत आहे. नदीच्या काठावर वसलेले म्हणुन नांदीकट, नंदिकड आणि नांदीकट या संस्कृत शब्दापासुन नांदेडची व्युत्पती होते. गोदावरीच्या दोन्ही तीरावर वसलेले म्हणुन नंदीकट. नांदेडचा उत्तरेकडील नंदवंशाच्या कारकिर्दीशी संबंध असावा, “नवनंदडेरा“ यापासून नांदेड झाले असावे.

राजकीयदृष्ट्या सुमारे ४०० पेक्षा अधिक वर्षापर्यंत नांदेडचा परिसर सातवाहनांच्या साम्राज्यात होता. सातनाहनानंतर इ.स. २५० चे सुमारास वाकाटकांनी राज्य केले. या घराण्यातील विन्ध्यशक्ती याने विदर्भात राज्य स्थापिले. व्दितीय रुद्रसेन या वाकाटक राजाची अग्रमहिषी प्रभावती गुप्त ही व्दितीय चंद्रगुप्ताची कन्या होती. प्रथम प्रवरसेन हा या घराण्याचा सर्वश्रेष्ठ राजा. तो पराक्रमी होता. साहित्यिक आणि प्रजाहितदक्ष होता. याने ६० वर्षे राज्य केले. दख्खनच्या फार मोठया भागावर यांचे अधिपत्य होते. वाकाटकांनंतर दक्षिण भारताच्या कांही भागांवर राज्य करणारे घराणे “बदामीचे चालुक्य“ म्हणुन संबोधिले जाते. यांची राजधानी कर्नाटकाच्या विजापूर जिल्ह्यातील वातापी (बदामी) येथे होती म्हणुन याला “बदामीचे चालुक्य घराणे” असे म्हणतात. या घराण्याच्या लेखात नांदेडचा “नंधाल” असा उल्लेख आढळतो.

नांदेडचे परिसराचे भाग्य राष्ट्रकूटांचे काळ उजळले होते तेवढे व तसे भाग्य आजतागायत त्याच्या नशिबी आले नाही, बदामीच्या चालुक्यानंतर “लत्तलूरपुरवराधि वर” असे स्वत:ला म्हणवुन घेणार्‍या राष्ट्रकूटांचे राज्य आले ते सुमा २०० वर्षे टिकले. राष्ट्रकूटांनी त्याच काळात कंधारला राजधानीचा मान मिळवुन दिला. 
राष्ट्रकूटांनंतर या भागावर राज्य केले ते कल्याणीच्या चालुक्य वंशीय राजांनी, महाराष्ट्राच्या अन्य कुठल्याही प्रदेशापेक्षा नांदेड आणि उस्मानाबाद या जिल्ह्याशी या घराण्याचा निकटचा संबंध होता. या काळात या परिसरात कितीतरी मंदिरे उभारली गेली. पैकी होट्टल, मुखेड, खानापूर, बार्‍हाळी, सुगांव, एकलारे, येशगी, सगरोळी, संगम करडखेड, तडखेल इत्यादी ठिकाणच्या मंदिरांची माहिती मिळते. 
कंधारपुरला राजधानी स्थापणारे राष्ट्रकूट पूढे कल्याणी चालुक्यांचे मंडलिक म्हणुन अकराव्या शतकात राहत होते. कल्याणीच्या चालुक्यांचे राज्य चालू असता या घराण्याच्या राज्यकालामुळे त्यात मध्येच खंड पडला. प्रस्तुत घराण्याला मराठवाड्याचे कलचुरी असे म्हणता येईल.

महाराष्ट्रभर केवळ नव्हे तर त्या बाहेरच्या विस्तृत प्रदेशावर राज्य करणारे हे यादवांचे घराणे, महाराष्ट्र महोदयाच्या इतिहासाच्या उष:काली सातवाहनांचे साम्राज्य जेवढ्या मह्त्वाचे होते तेवढेच प्रचीन काळच्या शेवटी या यादव घराण्याचे महत्त्व होते. सहाजिकच संपूर्ण नांदेड परिसर त्यांच्या अधिपत्याखाली होता. पांचव्या भिल्लमाने देवगिरी हे नगर वसलिले आणि तेथे आपली राजधानी हलविली. तेव्हां पासून मराठवाडा मह्त्वाचा ठरला. कृष्णेच्या उत्तरेकडील सारे राज्य. याच्या ताब्यात होते. रट्ट घराण्याच्या बल्लाळाची अमर्दकपूर (औंढा जि.हिंगोली) येथे राजधानी होती आणि उपराजधानी होती अराध्यपूर (अर्धापूर जि.नांदेड) येथे, या ठिकाणी बल्लाळाचा सेनापती चालुक्य याचा निवास असे.

मध्ययुगीन इतिहास

सन.१३१८ मध्ये यादवांचे राज्य कायमचे बुडले. महाराष्ट्र मुसलमानी सत्तेचा अमंल सुरू झाला. नांदेड परिसर त्याला अपवाद नव्हता. इसवी सन. १२९६ पर्यंत नांदेड परिसरावर देवगिरीच्या यादवांचा प्रभाव होता. यादवांच्या सत्तेचे एक प्रमुख ठाणे नांदेड नजिकच्या अर्धापूरात होते. हे अर्धापूर म्हणजे यादवकालीन आराध्यपूर. १४ व्या शदकाच्या प्रारंभी घडलेल्या या राजकीय स्थित्यंतराचे दूरगामी परिणाम महाराष्ट्राच्या आणि दख्खनच्या इतिहासावर झाले. अल्लाउद्दीन खिलजीच्या आक्रमणाने राजकीय संघर्षाचे एक नवे पर्व दख्खन पठारावर झाले.

आजच्या नांदेड जिल्ह्याचा मध्ययुगीन इतिहास एकुण दख्खन पठारावरील राजकीय घडामोडीशी प्रत्यक्ष संबंध ठेवून होता. मराठवाडा, विदर्भ आणि खानदेश या भूप्रदेशात घडणार्‍या संघर्षाचे पडसाद नांदेड घेण्याअगोदर दख्खन पठारावरील राजकीय स्थित्यंतरे समजुन घेणे अगत्याचे आहे. इसवी सनाच्या तेराव्या शतकापर्यंत मराठवाड्याचा वरिसर म्हणजेचे महाराष्ट्रातील गोदा खोरे, संपन्न अशा राजसत्ताचे माहेरघर होते. इसवीसन पूर्व ५ व्या शतकातील अश्मक आणि मूलक ही दोन्ही महाजनपदे या परिसरातील, त्यानंतर अनुक्रमे सातवाहन, वाकाटक, पुर्वचालुक्य, राष्ट्रकुल, उत्तरचालुक्य, यादव शिलाहार, कलचुरी या राजसत्तांच्या कालखंडात या परिसराने आर्थिक संपन्नता, राजकीय स्थैर्य, प्राचिन व्यापार उदीम उपभोगली. मोठ मोठी व्यापारी शहरे इथे उदयाला आली. अप्रतिम कालाविष्कार घडविले. द-याखो-यातून सह्याद्रीच्या कड्याकपारीतून अप्रतिम कला अविष्कार घडविले होते. या कला अविष्काराला उदार हस्ते मदत करणारे संपन्न व्यापारी इथे होते. राजघराण्याच्या कोषागारात अमित संपती होती. इथल्या संपन्नतेच्या कथा अरब व्यापार्‍यामार्फत सर्वदूर पसरल्या होत्या. १३ शतकात हे सारे बदलू लागले. पराकोटीचा सत्तासंघर्ष सुरु झाला. त्याची झळ नांदेड जिल्ह्यालाही बसली. या संघर्षाबरोबरच प्रशासन व्यवस्थेतही बदल घडले, नवी सुभेदारी व्यवस्था उदयास आली. इ.स. १३४६ साली दिल्लीच्या सलतनतीने दख्खन पठारावर चार सुभे निर्मीले. नांदेडचा समावेश या सनतनती सुभ्यामध्ये झाला. नांदेड जिल्ह्याचा समावेश व-हाड आणि बिदर तरफेत झालेला होता. सफदरखान सिस्तानी हा व-हाड तरफेचा तरपफदार होता. सत्तासंघर्षाचे नांदेड परिसरातील आणखी एक केंद्र होते माहुर, येथला डोंगरी किल्ला अनेक लढ्याचा साक्षीदार आहे. या किल्ल्याच्या परिसरात खरे तर गोंडाचे राज्य होते. गोंड हे दख्खनच्या पठारावरील वनक्षेत्राचे खरे राजे, तुघलक आणि बहमनी सत्तांच्या विस्ताराला गोंडांनी सतत विरोध केला. नांदेड जिल्ह्यातील खेरलाचा गोंड राज नरसिंगदेव हा देखील अनेक वर्षे बहमनीशी लढत राहिला. महमनी सलतनतीचा वजीर महंमद गवान याने बहमनी राज्याची प्रशासकीय पुर्रचना करण्याचे काम हाती घेतले. या महंमद गवानचे लष्करी ठाणे नांदेड शहराच्या परिसरातच होते. त्याची आठवण म्हणुन आजही नांदेडमध्ये वजिराबाद नावाची वस्ती आहे. या वजीर महंमद गवानने केलेल्या प्रशासकीय सुधारणेत बहमनी राज्याचे चार तरफ रद्द करण्यात येऊन आठ नवे सुभे निर्माण करण्यांत आले. या पुनर्रचनेनुसार आजचा नांदेड जिल्हा माहुर सुभ्याचा भाग बनला. नांदेड जिल्हा आकाराला यायला लागला तो येथपासून.

महंमद गवानच्या विरुध्द राजदरबारात मात्र बरेच राजकारण घडले इ.स. १४८१ साली या राजकीय कट कारस्थानचा परिणाम वजीर महंमद गवानच्या मृत्युत झाला. त्याला देहदंड देण्यापर्यंत सलतनतीतले कटकारस्थान पोहोचंले. पराकोटीचा सत्तासंघर्ष सगळीकडे चालु होता. १४८२ साली सुलतान महमंदशाह तिसरा बहमनी मृत्यु पावला व त्याचा १२ वर्षाचा मुलगा महमुदशाहा अल्पवयीन राजा म्हणून सत्तेवर आला. सलतनतीतील सारी सत्त कासीम बरीदने आपल्या हाती घेतली व पालनकर्ता राजा म्हणून तो कारभार पाहु लागला. नांदेड जिल्ह्यातील कंधारचा किल्ला हा कासीम बरीदचे प्रमुख लष्करी ठाणे बनला. इसवीसन १५२६ साली तिकडे दिल जहिरुद्दीन मुहंमद बाबरने मुघल सत्तेची स्थापना केली ही मुघलसत्ताही दख्खनच्या सत्ता्संघ येऊन उतरली. अहमदनगरच्या निजामशाहीत समाविष्ट असलेला व-हाड सुभा आणि त्यातला नांदेड जिल्हा इ.स. १५९६ मध्ये मुघलांच्या राज्यात समाविष्ट झाला. गेली तिनशे-साडेतिनशे वर्षे चाललेला स्थानिक मुस्लीम सलतनतीचा संघर्ष संपला आणि नांदेड जिल्हा पुन्हा दिल्लीपतीच्या अधिपत्याखाली आला.

१७ व्या शतकातील नांदेड

१७ व्या शतकातील नांदेड जिल्ह्याचा इतिहास म्हणे अहमदनगररची निजामशाही आणि मुघल सत्ता यांच्यातल्या संघर्षाची गाथा होय. दोन आडीच दशके हा संघर्ष चालला. १६३२ साली दौलताबादही मुघलांच्या ताब्यात आले. निजामशाहीतील कंधार आणि दौलाताबाद सारखी प्रमुख लष्करी ठाणी पडल्यामुळे मुघलांचा प्रभाव वाढला. नांदेड हे सुभ्याचे प्रमुख ठिकाण झाले. नांदेडच्या किल्यातून सुभ्याचा कारभार होऊ लागला. छत्रपती शिवरायांनी सामान्य रयतेचा विश्वास जागवला. त्याना लढण्याचे सामर्थ्य दिले. सत्तेचा उपभोग स्वत:च्या स्वार्थासाठी करण्यांच्या या मध्ययुगीन कालखंडात काळाची चौकठ भेदुन लोककल्याणाचा विचार करणारे मराठी स्वराज्य छत्रपती शिवाजी महाराजानी निर्मीले. मुघल-मराठा संघर्षातील लक्षणीय अशी लढाई नांदेड जिल्ह्यात झाली नसली तरी उभय पक्षाच्या पक्षाच्या फौजानी नांदेड परिसरात घोडदौड मारली. १६७० साली व-हाडवरील चढाईच्या वेळी शिवाजी महाराज नांदेडला आले होते. इ.स. १६५८ साली औरंगजेब मुघल सम्राट बनला. इ.स. १६८६ साली मुघलांनो विजापूर जिंकले. विजापुरची आदिलशाही आणि गोवलकोंड्याची कुतूबशाही या दोन सलतनतीच्या पाडवानंतर औरंगजेबाने मराठ्यावर सगळे लक्ष केंद्रीत केले. कंधारचा आपला लष्करी तळही मजबुत केला हमिदुद्दीनखान या किल्लेदाराने याच काळात कंधारच्या किल्यावर आपला तळ ठोकला, मुघल-मराठा संघर्ष तीव्रतर बनत चालला. हा संघर्ष चालू असतांना नांदेड परिसरातील सामान्य रयतेचे जिव अत्यंत हालाखीचे झाले होते. अनेक लोक स्थालांतरीत होऊ लागले. याच काळात नांदेड मधील कांह घराणी काशी प्रयाग अशा तिर्थक्षेत्री स्थलांतरत झालेली दिसतात. १८ व्या शतकातील संघर्षही मुख्यत: मुघल आणि मराठा यांच्यातला सत्तासंघर्ष होता.

श्री गुरुगोविंद सिंघाची नांदेड भेट

इ.स. १७०४ च्या नंतर मुघल–मराठा संघर्ष अशा वळण येऊन पोहोचला की मुघलांचा पराजय स्पष्टपणे जाणवावा. मराठ्यानी दख्खन पठारावरील आपली सारी ठाणी परत मिळवली. आजचा नांदेड जिल्हा त्याकाळातल्या नांदेड आणि माहूर जिल्ह्यात विभागलेला होता. त्यातले माहुर हे वर्‍हाड सुभ्यात समाविष्ट होते तर नांदेड समावेश बिदर सुभ्यात झालेला होता. नांदेडची विभागणी ३० परगण्यात आणि ९४९ गावात झाली होती तर माहूर जिल्ह्यात २० तालुके- परगणे आणि ११४१ गावं होती. राजकीय सत्तासंघर्षाच्या या धामधुमीत नांदेड शहराला अन्यनयसाधारण मह्त्व प्राप्त करुन देणारी एक लक्षणीय घटना घडली. या घटनेचे महत्व स्थानिक नांदेड पुरते मर्यादित न राहता भारतीय इतिहासात नांदेडला एक आगळे स्थान प्राप्त करुन देणारी ही घटना आहे. एका नव्या युगाचा प्रारंभ झाल्याची साक्ष नांदेड परिसर देत होता. आज पासून तीनशे वर्षापूर्वीची श्री गुरुगोविंद सिंघाची नांदेड भेट ही घटना केवळ त्यांच्या अंतकाळापुरती मर्यादत राहत नाही तर गुरु ग्रंथसाहिबच्या रुपात झालेल्या तत्वचिंतनाची ती मुहुर्तमेढ ठरते. शिखधर्मासंबंधीचे कांही मह्त्वपुर्ण हुकूम नांदेड मुक्कामाहून निघाले आहेत. त्यामुळे नांदेडला एक आगळे मह्त्व आहे. १७२४ च्या आक्टोबर महिन्यात मुघल आणि निजामी सैन्यात साखरखंडी येथे मोठी लढाई झाली. दख्खनचे सहा मुघल सुभे निजामच्या ताब्यात आले. मुघल साम्राज्याचा सुभेदार म्हणुन निजामाने दख्खनचे सुभे ताब्यात घेतले असले तरी प्रत्यक्षात साखरखंडी येथील लढाईतील विजयामुळे मुघलाना पराभूत करुन चिन कुलीखान निजाम-उल् मुल्कने आपले स्वतंत्र राज्यच अस्तित्वात आणले होते. या स्वतंत्र राज्याचा कारभार औरंबादेतुन पाहिला जाऊ लागाला. नांदेड जिल्हा आता मुघलाच्या वर्चस्वातुन बाहेर पडला आणि स्वतंत्र निजामी राज्याचा भाग बनला कालांतराने निजामी राज्याची राजधानी, हैद्राबादला स्थलांतरीत झाली.

      इ.स. १७२४ मधला नांदेड जिल्हा म्हणजे नांदेड सरकार खुप विस्तृत होते. आजचा नांदेड जिल्हा,अदिलाबादद आणि निजामाबाद जिल्हा हा सारा परिसर मिळुन हे नांदेड सरकार बनले होते. या काळात इंग्रज आणि फ्रेंच व्यापारी आपल्या फौज दख्खनच्या राजकारणात उतरले होते.

आधुनिक काळ

महाराष्ट्राच्या संदर्भामध्ये सन.१८१८ पासून आधुनिक काळाची सुरुवात मानावी लागते. या एतद्देशीय सत्तेचा अस्त होऊन पेशवाई संपुष्टात आली व ब्रिटीस राज्य स्थिरावले. इ.स. १८५३ साली इंग्रज आणि निजाम यांच्यात एक नवा करार झाला. या करारान्वये हैद्राबादच्या निजामाने आपल्या राज्यातला पन्नास लाख शेतसारा वसुल करता येण्याजोगा भूप्रदेश इंग्रजाच्या ताब्यात द्यायचे कबुल केले. त्याअन्वये सारा विदर्भ सरकार हा विभाग इंग्रजांचा बराचसा बाग आणि नांदेड परिसरातील हदगांव, माहुर, किनवट हा भाग मात्र हैद्राबाद राज्यातच राहिला. अशा प्रकारे हदगांव, माहूर, किनवट हे भाग विदर्भ सरकारातून नांदेड सरकारात दाखल झाले. नांदेड जिल्ह्याच्या दृष्टीने हा बदल लक्षणीय आहे. नबाब सालारजंगने ही गुत्तेदारी पध्दत आणि शेतसारा वसुलीच्या इतर पध्दती बंद करुन एक नवी शेतसारा पध्दत, जिल्हाबंदीपध्दती अंमलात आणली. रोव्हेन्यू सर्वे अँन्ड सेटलमेंट डिपार्टमेंट स्थापन करण्यांत आले. शेतसारा वसुलीसाठी शासकीय महसुल यंत्रणा निर्माण करण्यांत आली. १८८१ च्या दरम्यान आठ तालुक्यांचा नांदेड जिल्हा आकाराला आला आणि औरंगाबाद सुभ्याचा भाग बनला. १८८५साली सुभेदार पद पुन्हा निर्माण झाले आणि ते १९४९ पर्यंत कायम होते. जिल्हा प्रशासनाचा प्रमुख म्हणुन तालुकापद निर्माण झाले ते १९४९ पर्यंत कायम होते. तालुका पातळीवर तहसिलदार पद होते. जिल्हा प्रशासनात नायब तालुकदार,पेशकार, शिरस्तेदार अशी कांही पदेही होती. हैद्राबाद शहरात १८५५ साली स्टेट बँक काढण्यांत आली. अधुनिक बँकींग व्यावस्था सुरु झाली. कालातंराने निजामी राज्यातल्या कांही गावांत स्टेट बँकेच्या शाखा निघाल्या. नांदेड जिल्ह्यातील उमरी या बाजारपेठत अशीच एक शाखा उघडली गेली. हैद्राबाद राज्याची राजभाषा फार्शी होती, फार्शी शिक्षण देणारे मदरसे कांही ठिकाणी होते. १८६८ साळी नांदेडलाही एक फारसी मदरसा निघाली. इ.स.१८८४ मध्ये फार्शी एेवजी उर्दुला राजभाषेचा मान मिळाला. शिक्षणाचे माध्यम उर्दु झाले. इग्रजांच्या प्रभावातुन दळणवळणाची साधने वाढली. हैद्राबाद ते वाडी पर्यंत रेल्वे सुरु झाली. इ.स. १९०० साली नांदेड या गावात रल्वे आली. हैद्राबाद-मनमाड असा मिटर गेज रेल्वे मार्ग पुर्ण झाला. आणि या रेल्वेमार्गावरील एक रेल्वे स्टेशन नांदेड गावाजवळ उभारले गेले. १९४२ च्या चलेजाव आंदोलनाचेही असेच पडसाद राज्यात उमटले. स्वामी रामानंद तिर्थानी या आंदोलनाच्या दृष्टीने संघटन कार्य सुरु केले. हैद्राबाद राजकारणाची पावले आझाद हैद्राबादच्या दिसेने पडु लागली होती. हैद्राबादच्या निजामाची भूमीकाही या वाटचालीला पुरक होती.

मुक्तिसंग्राम पर्व

१६ ऑगस्ट  १९४६ रोजी स्टेट कॉंग्रेससाची बैठक हैद्राबादला संपन्न झाली. कॉंग्रेस मधला जहाल गट प्रभावी पणे सक्रिय झाला. रझाकाराच्या आक्रमक पवित्र्यामुळे आता जीवनमरणाचा अंतिम संघर्ष पुढे दिसत होता. १९४६ च्या अखेरीस महाराष्ट्र परिषदेचे हैद्राबाद स्टेट कॉंग्रेस मध्ये विलीणीकरण झाले. हैद्राबाद स्टेट कॉंग्रेससाचे पहिले अधिवेशन मुझीराबाद येथे १६ ते १८ जुन या काळात संपन्न झाले. स्वामी रामानंद तिर्थाची स्टेट कॉंग्रेससचे पहिले अध्यक्ष म्हणुन निवड झाली. त्यानी या अधिवेशनातच निजामाच्या आझाद हैद्राबाद विरुध्दच्या आणि प्रस्तावित स्वतंत्र भारतातल्या हैद्राबादच्या विलीनीकरणाच्या अंतिम लढ्याचे रणसिंघ फुंकले.

१५ ऑगस्ट १९४७ ला भारत स्वतंत्र होणार या पार्शभुमीवर हैद्राबादच्या निजामाने राज्यातल्या रयतेवर अनेक निर्बध लादले.सभा बंदी, भाषण बंदी, हिंदी संघराज्याच्या म्हणजेच तिरंगा झेंड्यावर बंदी अशा अनेक प्रकारच्या बंदी लादणारे फर्मान काढले गेले. स्वतंत्र होऊ घातलेल्या भारताचा तिरंगा ध्वज हा हैद्राबाद राज्यात परकीय ध्वज ठरवला जाऊन  तो ध्वज फडकवणार्याणस राजद्रोही मानले गेले. अशा अवस्थेत स्वतंत्र भारतात विलीन होऊ इच्छिणारी राज्यातली ८५% जनता अधिकाधिक अस्वस्थ होत गेली. असंतोष भडकत गेला. विलिनीकरणाच्या मागणीने उग्र अशा आंदोलनाचे रुप धारण केले.इंग्रजांनी भारतसोडुन जायचे ठरवले त्याच्या ताब्यात असलेल्या भारताला स्वातंत्र्य मिळणार ही गोष्ट स्पष्ट झाली. त्याचबरोबर भारतातल्या ५६५ राजांनाही इंग्रजांनी स्वातंत्र्य द्यावयाचे ठरवले, याचा अर्थ हैद्राबादच्या निजाम उस्मान अलीला स्वातंत्र्य मिळणार होते. १५ आगस्ट १९४७ भारताला स्वातंत्र्य मिळाले तेंव्हा या स्वातंत्र्य प्राप्तीचा निखळ आनंद नांदेड परिसरातील लोकांना उपभोगता आला नाही. सार्या  हैद्राबाद राज्यातच पोलिसांचा रझाकराचा ससेमिरा चुकवत तीर फडकावण्याचे प्रयत्न झाले. तिरंगा फडकवणार्याी कार्यकर्त्याना राज्यद्रोही ठरवुन तुरुंगात डांबण्यात आले. विलिनीकरण दिन म्हणुन हा दिवस साजरा झाला.

१५ सप्टेंबर १९४७ पर्यंत राज्यभरात आंदोलनाने व्यापक स्वरुप धारण केले होते. हैद्राबाद राज्य पुरभिलेखागारातील उपलब्ध कागदपत्रातून तुरुंगात डांबलेल्या १९४८ च्या ऑगस्ट सप्टेबर महिन्यात हैद्राबाद राज्यातली परिस्थिती दिवसेन् दिवस तणावपुर्ण बनत गेली. रझाकाराचे अत्याचार वाढत गेले. १३ सप्टेंबर १९४८ या रोजी स्वतंत्र भारताच्या फौजा हैद्राबाद राज्यात शिरल्या आणि     “आपरेशन पोलो” सुरु झाले. चार दिवसात हैद्राबादच्या सैन्याने शरणागती पत्कारली, हैद्राबाद सैन्याचा सेनापती अल् इद्रुसने शरणागती पत्कारली आणि हैद्राबादेत तिरंगा फडकला. नांदेडच्या अव्वल तालुकदार कार्यालयावरही तिरंगा फडकला. हळुहळु स्थित्यंतर घडु लागले. अव्वल तालुकदाराच्या जागी नांदेडलाही कलेक्टर आला. मध्ययुगीन निजामी सलतनतीच्या कारभाराचे रुपांतर अधुनिक पजासत्ताकीय यंत्रणेत होऊ लागले. प्रत्येक जिल्ह्यासाठी नागरी प्रशासक, जिल्हा पोलीस प्रमुख नेमला गेला. लष्करी प्रशासनाचा काळ संपल्यानंतर नागरी प्रशासकाच्या जागी कलेक्टर नेमले गेले.

 

राज्य पुनर्रचना आणि महाराष्ट्र राज्य निर्मिती

१९२० साली अखिल भारतीय कॉंग्रेसने घटनेच्या पहिल्या मसुद्यातच भाषावार प्रांत रचनेचा विचार समाविष्ट केला होता. १९५५ साली फाजलअली अहवाल सादर झाला. व्देभाषीक मुंबई राज्य अस्तित्वात आले. हैद्राबाद राज्याचे विभाजन झाले. मराठवाडा मुंबई राज्यात समाविष्ट झाला. नांदेड जिल्ह आता हैद्राबाद राज्यातून मुंबई राज्यात समाविष्ट झाला. १ मे १९६० रोजी मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्र अस्तित्वात आला. मुंबई प्रांताचे विभाजन होऊन गुजरात आणि महाराष्ट्र ही दोन राज्ये निर्मीली गेली.
आता नांदेड जिल्हा महाराष्ट्र राज्याचा भाग बनला. अत्यंत संथ गतीने वाटचाल करणारे मध्ययुगीन सलतनतीतले नांदेड आता झपाट्याने बदलु लागले. नंदीतटांचे नांदेड आता लहान गावठाण राहीले नाही, शहर बनले, पाहता पाहता शहराचा विस्तार घडत गेला आणि नांदेड- वाघाला महानगरपालीका अस्तित्वात आली. संपुर्ण जिल्ह्यात मिळुन एक हायस्कुल असलेल्या नांदेडात स्वामी रामानंद तिर्थ मराठवाडा विद्यापिठ स्थापन झाले. अनेक महाविद्यालये निघाली. मेडीकल, इंजिनिअरीग,लाँ,फार्मसी अशा विविध विद्याशाखांचे शिक्षण देणारी महाविद्यालये अस्तित्वात आली. नांदेड जिल्ह्याने मध्ययुगीन मागसलेपणाची कात टाकुन २१ व्या शतकाकडे वाटचाल सुरु केली आहे.

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स्वामी विवेकानंद

 युवा दिन स्वामी विवेकानंद *🇮🇳 स्वातंत्र्याचा अमृत महोत्सव 🇮🇳* ➿➿➿➿➿➿➿➿➿        🇮🇳 *गाथा बलिदानाची* 🇮🇳                  ▬ ❚❂❚❂❚ ▬   ...